अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
हिंसारोषविमुक्तात्मा स वै धर्मेण युज्यते ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
हिंसार्थं निकृतिप्रज्ञः प्रोद्वेजय़ति चैव ह ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
हिंसाविहाराभिरतस्तन्द्रीनिद्रासमन्वितः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५८
भीष्म उवाच
हिंसाविहारी सततमविशेषगुणागुणः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
हिंसाशीघ्रमहावेगं नानारसमहाकरम् ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
हिंसाहिंसे तपो यज्ञः संय़मोऽथ विषाविषम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५७
भीष्म उवाच
हिंसाय़ां हि प्रवृत्ताय़ामाशीरेषानुकल्पिता ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
हिंसितश्च न हिंसेत तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
हिंस्यात्क्रोधादवध्यांश्च वध्यान्सम्पूजय़ेदपि |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
हिंस्राणां प्राणिहन्तॄणामाससाद वने क्वचित् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मे ऋतानृते |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
हिंसय़ामास दैतेय़ इल्वलो दुष्टचेतनः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
हिङ्गु द्रव्येषु शाकेषु पलाण्डुं लशुनं तथा ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
हिडिम्वं निहतं दृष्ट्वा संहृष्टास्ते तरस्विनः |
३१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
हिडिम्वदर्शने चैव तथा त्वमभवो गतिः ||
२३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१५१
सञ्जय़ उवाच
हिडिम्ववककिर्मीरा निहता मम वान्धवाः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
हिडिम्ववककिर्मीरा भीमसेनेन पातिताः |
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
हिडिम्ववकमुख्यानां किर्मीरस्य च रक्षसः ||
२२ ग
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
हिडिम्ववकय़ोः पाप न त्वमश्रुप्रमार्जनम् |
६६ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
हिडिम्वश्च सखा मह्यं दय़ितो वनगोचरः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
हिडिम्वस्य वधाच्चैव विश्वासो मे वृकोदरे ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
हिडिम्वा तु ततः कुन्तीमभिवाद्य कृताञ्जलिः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
हिडिम्वा समय़ं कृत्वा स्वां गतिं प्रत्यपद्यत ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
हिडिम्वामग्रतः कृत्वा यस्यां जातो घटोत्कचः ||
९७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
हिडिम्वाय़ां च भीमेन वने जज्ञे घटोत्कचः ||
१०३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
हिडिम्वे भक्षय़िष्यावो न चिरं कर्तुमर्हसि ||
९० ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
भीम उवाच
हिडिम्वे व्रज पन्थानं त्वं वै भ्रातृनिषेवितम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
हिडिम्वोवाच वित्रस्ता भीमसेनमिदं वचः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
हितं कर्तास्मि भवतामिति तत्कर्तुमर्हसि ||
१०१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
हितं च नाभ्यसूय़न्ति पण्डिता भरतर्षभ ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
हितं च परिणामे यत्तदद्यं भूतिमिच्छता ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
अर्जुन उवाच
हितं चैव यथास्माकं तथैतद्वचनं तव ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
हितं तद्वचनं श्रुत्वा कौसल्योऽन्वशिषन्महीम् |
६७ क
आदि पर्व
अध्याय
१९६
द्रोण उवाच
हितं तु परमं कर्ण व्रवीमि कुरुवर्धनम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
हितं ते सानुवन्धस्य तथाय़त्यां सुखोदय़म् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
हितं तेषामहितं मामकाना; मेतत्सर्वं मम नोपैति चेतः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
अर्जुन उवाच
हितं नादास्यते वालो दिष्टस्य वशमेष्यति ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९८
धृतराष्ट्र उवाच
हितं परमकं वाक्यं त्वं च सत्यं व्रवीषि माम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
हितं यत्सर्वभूतानामात्मनश्च सुखावहम् |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
हितं वलवदप्येषां तिष्ठतां तव शासने ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
हितं वाप्यहितं वापि न विचार्यं नरर्षभ ||
१३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
हितं हि तव तद्वाक्यमुक्तवान्कुरुसत्तमः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
हितं हि धार्तराष्ट्राणां पाण्डवानां तथैव च |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
हितं हि परमं मन्ये विदुरो यत्प्रभाषते |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
हितप्रिय़ंवदैः काले वहुभिः पुण्यगन्धिभिः |
३० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
हितवुद्धीननादृत्य संमन्त्र्यासाधुभिः सह |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
हितान्युक्तानि विदुरद्रोणगाङ्गेय़केशवैः |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
हितार्थं धार्तराष्ट्रस्य व्रवीमि त्वा न हिंसय़ा |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
हितार्थं पाण्डुपुत्रस्य सैन्धवस्य वधे वृतः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
हितार्थं पाण्डुपुत्राणां कुण्डले मे प्रय़ाचितुम् |
३० क