आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
कोऽय़मन्नमिदं भुङ्क्ते मदर्थमुपकल्पितम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
कोऽय़मित्यागतक्षोभः कौतूहलपरोऽभवत् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
कौकुट्टकास्तथा चोलाः कोङ्कणा मालवाणकाः ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
कौटिल्यं कौलटेय़ं च कुसीदं च विवर्जय़ेत् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
रुद्र उवाच
कौतूहलं चापि हि मे एकान्तगमनेन ते |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
कौतूहलं महज्जातं साध्वसं चागतं मम ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
पुरोहित उवाच
कौतूहलं मे सुभृशं तत्त्वेन कथय़स्व मे ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
युधिष्ठिर उवाच
कौतूहलं मे सुमहज्जामदग्न्यं प्रति प्रभो |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
कौतूहलं हि परमं तत्र मे वर्तते प्रभो |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९१
युधिष्ठिर उवाच
कौतूहलं हि मे जातं तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
कौतूहलपराः सर्वे पितामहमथाव्रुवन् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
कौतूहलमला साध्वी विप्रवासमलाः स्त्रिय़ः ||
६४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
कौतूहलसमाविष्टः प्रविवेश गृहं द्विजः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२०७
युधिष्ठिर उवाच
कौतूहलसमाविष्टो यथातथ्यं महामुने ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
कौतूहलात्कण्टकेन वुद्धिमोहवलात्कृता ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
कौतूहलात्तु तं लव्ध्वा वालिश्यादाचरं तदा |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२९०
कुन्त्यु उवाच
कौतूहलात्समाहूतः प्रसीद भगवन्निति ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
कौतूहलाद्विस्मितचारुनेत्रा; पप्रच्छ माता मकरध्वजस्य ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
युधिष्ठिर उवाच
कौतूहलानुप्रवणा हर्षं जनय़तीव मे ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
कौतूहलान्वितो राजन्राजधर्माणमैक्षत ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
कौतूहलेन नगरं दीर्यमाणमिवाभवत् |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
कौन्तेय़ तं न हिंसेत यो महीं विजिगीषते ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
कौन्तेय़ प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
कौन्तेय़ यदि वै प्रश्नान्मय़ोक्तान्प्रतिपत्स्यसे |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
कौन्तेय़ सर्वभूतानां तत्र मे नास्ति संशय़ः ||
२९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
कौन्तेय़ं समनुज्ञातुमिय़ेष भरतर्षभ ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४३
कुन्त्यु उवाच
कौन्तेय़स्त्वं न राधेय़ो न तवाधिरथः पिता |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
कौन्तेय़स्त्वं न राधेय़ो विदितो नारदान्मम |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
कौन्तेय़स्त्वर्जुनो राजन्नेकलव्यमनुस्मरन् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
अर्जुन उवाच
कौन्तेय़ा हि वय़ं साधो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
कौन्तेय़ान्मनुजेन्द्राणां विस्मय़ः समजाय़त ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
कौन्तेय़ेनाग्रतः सृष्टा न्यपतन्पृष्ठतः शराः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
कौन्तेय़ोऽपहृतस्तस्मिञ्शय़ने स्वर्गसंमिते ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
कौपीनाच्छादनं यावत्तावदिच्छेच्च चीवरम् ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
कौमारं व्रह्मचर्यं ते जानामि द्विजसत्तम |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
स्त्र्यु उवाच
कौमारं व्रह्मचर्यं मे कन्यैवास्मि न संशय़ः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२८२
गौतम उवाच
कौमारं व्रह्मचर्यं मे गुरवोऽग्निश्च तोषिताः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
कौमारदारव्रतवान्मैत्रेय़ निरतो भव |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
कौमारमेव ते चित्तं तथैवाद्य यथा पुरा |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
कौमाररूपमापन्नं रूपतो नोपलभ्यते ||
११९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
कौमाराद्यौवनं चापि स्थाविर्यं चापि यौवनात् |
१२० क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
कौमारिकाणां शीलेन वक्ष्याम्यहमरिन्दम ||
८२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
कौमारे यानि चाप्यासन्नप्रिय़ाणि विशां पते |
७६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
कौमुदे तु विशेषेण शुक्लपक्षे नराधिप |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
कौमुदे मासि रेवत्यां शरदन्ते हिमागमे |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
कौमुद्यां शुक्लपक्षे तु योऽन्नदानं करोत्युत |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
कौरवं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पय़त् ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
कौरवं सात्यकिश्चैव शरैः संनतपर्वभिः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
कौरवः पार्थिवो वीरस्तावद्वारय़ तं द्रुतम् ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
कौरवः सोमवंशीय़ः कुन्त्या गर्भेण धारितः |
३ क