chevron_left  हिमवत्पार्श्वमभ्येत्यarrow_drop_down
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवत्पार्श्वमभ्येत्य यो मय़ा तपसार्चितः ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
हिमवत्पुष्पजं चैव स्वादु क्षौद्रं तथा वहु ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
हिमवत्पृष्ठजः कश्चिच्छल्मलिः परिवारवान् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ६९
विदुर उवाच
हिमवत्यनुशिष्टोऽसि मेरुसावर्णिना पुरा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवत्यमरैर्जुष्टं वह्वाश्चर्यसमाकुलम् ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय ४६
दुर्योधन उवाच
हिमवत्सागरानूपाः सर्वरत्नाकरास्तथा |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
हिमवद्दुर्गनिलय़ाः किराता रणकर्कशाः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवद्वनसम्भूतं सिंहं केसरिणं यथा ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
हिमवन्तं गिरिश्रेष्ठं सिद्धचारणसेवितम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम् ||
१०१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवन्तं जगामाशु यत्रास्य स्वक आश्रमः ||
२ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवन्तं त्वय़ा गुप्ता गमिष्यामः पितामह |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
हिमवन्तं समासाद्य महानासीद्वनस्पतिः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४
शल्य उवाच
हिमवन्तमतिक्रम्य उत्तरं पार्श्वमागमत् ||
५ ग
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवन्तमतिक्रम्य गन्धमादनमेव च |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवन्तमतिक्रम्य प्रय़यौ गन्धमादनम् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
हिमवन्तमिय़ाद्द्रष्टुं सिद्धचारणसेवितम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
हिमवर्षातपानां च परित्राणानि कुर्वते |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवांश्च समुद्रश्च वज्री च वलभित्स्वय़म् |
१० क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवांश्च सुदुर्गोऽय़ं यक्षराक्षससङ्कुलः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवांश्चैव विन्ध्यश्च मेरुश्चानेकशृङ्गवान् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
हिमवानिव शैलानां समुद्रः सरितामिव |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवानिव शैलेन्द्रो वहुप्रस्रवणस्तदा ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
हिमवान्पर्वतश्चैव दिव्यौषधिसमन्वितः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
हिमवान्पारिय़ात्रश्च विन्ध्यो मलय़ एव च |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
हिमवान्पारिय़ात्रश्च सह्यो विन्ध्यस्त्रिकूटवान् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवान्प्रददौ राजन्हुताशनसुताय़ वै ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
हिमवान्वा महाशैलः समुद्रो वा महोदधिः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
हिमवान्हेमकूटश्च निषधश्च नगोत्तमः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
हिमागमे महाराज व्यभ्रा इव महीधराः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
हिमाग्निघोरसदृशो राजा भवति कश्चन |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
हिमात्यये कक्षगतो यथाग्नि; स्तहा दहेय़ं सगणान्प्रसह्य ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
हिमात्यये यथा कक्षं शुष्कं वातेरितो महान् |
४६ क
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
हिमान्ते पुष्पितौ शालौ मरुता गलिताविव ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
हिमापहो हव्यमुदावहंस्त्वरं; स्तथामृतं चार्पितमीश्वराय़ ह ||
११७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
हिमावदातेन सुवर्णमालिना; हिमाद्रिकूटप्रतिमेन दन्तिना |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
हिरण्मय़ं वुद्धिमतां परां गतिं; स वुद्धिमान्वुद्धिमतीत्य तिष्ठति ||
४४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४०
व्रह्मो उवाच
हिरण्मय़ं वुद्धिमतां परां गतिं; स वुद्धिमान्वुद्धिमतीत्य तिष्ठति ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
हिरण्मय़ं श्वेतहय़ैश्चतुर्भि; र्यदा युक्तं स्यन्दनं माधवस्य |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
हिरण्मय़ांश्च ते कुम्भान्राजतान्पार्थिवांस्तथा |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १९६
द्रोण उवाच
हिरण्मय़ानि शुभ्राणि वहून्याभरणानि च |
७ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
हिरण्मय़ीनां मध्यस्थं कदलीनां महाद्युतिम् |
७० क
वन पर्व
अध्याय १२१
लोमश उवाच
हिरण्मय़ीभिर्गोभिश्च कृताभिर्विश्वकर्मणा |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
हिरण्मय़ौ शकुनी साम्पराय़ौ; नासत्यदस्रौ सुनसौ वैजय़न्तौ |
६१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
हिरण्यं कुप्यभूय़िष्ठं मित्रं क्षीणमकोशवत् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
सुधन्वो उवाच
हिरण्यं च गवाश्वं च तवैवास्तु विरोचन |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विरोचन उवाच
हिरण्यं च गवाश्वं च यद्वित्तमसुरेषु नः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
हिरण्यं दीय़तामेभ्यो द्विजातिभ्यो धरास्तु ते ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १२१
राम उवाच
हिरण्यं मम यच्चान्यद्वसु किञ्चन विद्यते |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४४
व्रह्मो उवाच
हिरण्यं सर्वरत्नानामोषधीनां यवास्तथा ||
८ ख