शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
समेत्य सर्वे वाधन्ते स विनश्यत्यरक्षितः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
समेत्य सर्वे शोचन्ति यदा राजा प्रमाद्यति ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
समेत्य सर्वे सहिताः सुहृद्भि; स्तेषां विनाशाय़ यतेय़ुरेव ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
समेत्य सहिता भूय़ः समरे भृगुनन्दनम् ||
२८ ग
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
समेत्य सहिता राजन्यथाप्राप्तं यथासुखम् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
समेत्याहं सूतपुत्रेण सङ्ख्ये; वृत्रेण वज्रीव नरेन्द्रमुख्य |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
समेधय़ति यन्नित्यं सर्वार्थान्सर्वकर्मभिः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
समेधय़ति यन्नित्यं सर्वार्थान्सर्वकर्मसु |
९० क
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
समेन देवय़ानेन पथा स्वर्गमुपेय़ुषः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
समेन भूमिभागेन यय़ौ प्रीतिपुरस्कृतः ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
समेन सर्वभूतेषु निःस्पृहेण निराशिषा |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
समेष्यति त्वय़ा चैव तेन सार्धमनुव्रज ||
१०६ ख
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
समेष्यसि च दारैस्त्वं मा स्म शोके मनः कृथाः |
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
समेष्यामि रणे राजन्वहुभिर्युद्धदुर्मदैः ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
समेय़ातां नरव्याघ्रौ व्याघ्राविव तरस्विनौ ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
समैः सम्यक्प्रय़ुक्तैश्च वचनैः प्रश्रय़ोत्तरैः |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
समैरुदङ्मुखैर्मार्गैर्यथोद्दिष्टं परन्तपाः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
समैर्विवाहं कुरुते न हीनैः; समैः सख्यं व्यवहारं कथाश्च |
९८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
समो न त्वं द्विजातिभ्यः श्रेष्ठं विद्धि नराधिप |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
समो भवति निर्द्वन्द्वो व्रह्म सम्पद्यते तदा ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
समोऽस्तु देव विजय़ एतय़ोर्नरसिंहय़ोः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
समोऽस्मि सर्वभूतेषु पश्य मे जाजले व्रतम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
समोऽहं सर्वभूतानामधर्मं नेह रोचय़े |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय़ः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
समौ च त्वय़ि राजेन्द्र तेषु पाण्डुसुतेषु च ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
विश्वामित्र उवाच
समौ च श्वमृगौ मन्ये तस्माद्भक्ष्या श्वजाघनी ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
समौ तावपि मे स्यातां न हि मे स्तः प्रिय़ाप्रिय़े |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
सम्पतद्भिः शरैर्घोरैरवाकीर्यत मेदिनी ||
४० ख
विराट पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पतद्भिः स्थितैश्चैव नानारत्नावभासितैः |
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
सम्पतद्भिर्महावेगैरितो याद्भिश्च सद्गतिम् ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
सम्पतन्तः स्म दृश्यन्ते गोमाय़ुवकवाय़साः |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
सम्पतन्तः स्म दृश्यन्ते निघ्नमानाः परस्परम् ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सम्पतन्तः स्म दृश्यन्ते शलभानां व्रजा इव ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
सम्पतन्ति च भूतानि क्रव्यादानि प्रहृष्टवत् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पतन्ति वनान्तेषु समवाय़ांश्च कुर्वते ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
सम्पतन्तीभिराकाशमावृतं वह्वशोभत ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
सम्पतन्तो व्यदृश्यन्त भ्राजमाना इवाग्नय़ः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
सम्पतन्त्यासुरीं योनिं यज्ञप्रसववर्जिताम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
सम्पतन्देहजालानि कदाचिदिह मानुषे |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
शल्य उवाच
सम्पत्स्यत्येष ते कामः कुन्तीपुत्र यथेप्सितः |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
सम्पद्यदैषा भवति सा विभर्ति सुखं प्रजाः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
सम्पन्नं भोजने नित्यं पानीय़े तर्पणं तथा |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
सम्पन्नतरमेवान्नं दरिद्रा भुञ्जते सदा |
४८ क
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पन्नसस्या च मही निरीतीका भविष्यति ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
सम्परित्यक्तधर्मात्मा सुनिर्णिक्तात्मकल्मषः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
सम्परित्यज्य जीवामो हीनार्था हतवान्धवाः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
सम्परिष्वज्य कौन्तेय़ः सन्देष्टुमुपचक्रमे ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
सम्परिष्वज्य वाहुभ्यां तत्रैवान्तरधीय़त ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
सम्परिष्वज्य सुहृदं प्रीत्या परमय़ा युतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
सम्पश्यत जगत्सर्वं सुखदुःखैरधिष्ठितम् |
६ क