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अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
सप्तर्षीणां सदा लोके सोऽप्सरोभिर्वसेत्सह |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
सप्तर्षीणामथोर्ध्वं च विपृथुर्नाम पार्थिवः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
नारद उवाच
सप्तर्षीणामन्यतमं वेषमास्थाय़ भारत |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
सप्तर्षीणामुदाराणां समवच्छाद्य वै प्रभाम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
सप्तर्षीनाह च स्वाहा मम पुत्रोऽय़मित्युत |
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
सप्तर्षीन्पृष्ठतः कृत्वा युध्येरन्नचला इव |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २६
मार्कण्डेय़ उवाच
सप्तर्षय़ः पार्थ दिवि प्रभान्ति; नेशे वलस्येति चरेदधर्मम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
सप्तर्षय़ः सप्त चाप्यर्हणानि; सप्ततन्त्री प्रथिता चैव वीणा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
सप्तर्षय़श्चान्वय़ुञ्जन्नराणां दण्डधारणे ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
सप्तर्षय़ो जातभय़ास्तथा देवर्षय़ोऽपि च ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
सप्तर्षय़ो महात्मानः कश्यपश्च प्रजापतिः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
सप्तर्षय़ो मां वक्ष्यन्ति सर्वे व्रह्मर्षय़स्तथा |
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
सप्तर्षय़ो वालखिल्यास्तथैव च मरीचिपाः |
११ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च प्रजास्यन्ति नरास्तदा ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च स्त्रिय़ो गर्भधरा नृप |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
सप्तविंशति सोमस्य पत्न्यो लोके परिश्रुताः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
सप्तविंशतिरध्याय़ाः पर्वण्यस्मिन्नुदाहृताः ||
१९४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
सप्तविंशे तु दिवसे यः प्राशेदेकभोजनम् |
१०७ क
आदि पर्व
अध्याय ५२
सूत उवाच
सप्तशीर्षा द्विशीर्षाश्च पञ्चशीर्षास्तथापरे |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
सप्तशीर्षो महाकाय़स्तीक्ष्णदंष्ट्रो विषोल्वणः |
१२३ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
सप्तषष्टिरथो पूर्णा श्लोकाग्रमपि मे शृणु |
१३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
सप्तसप्ततिभिर्भोजस्तं विद्ध्वा निशितैः शरैः |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
जनमेजय़ उवाच
सप्तसारस्वतं कस्मात्कश्च मङ्कणको मुनिः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
सप्तसारस्वतं चैव तीर्थं पुण्यं तथा स्मृतम् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
सप्तसारस्वतं तीर्थं ततस्तत्प्रथितं भुवि ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सप्तसारस्वतं तीर्थं ततो गच्छेन्नराधिप |
९७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
सप्तसारस्वतं तीर्थमाजगाम हलाय़ुधः |
६३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
ऋषिरु उवाच
सप्तसारस्वते चास्मिन्यो मामर्चिष्यते नरः |
४९ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सप्तसारस्वते स्नात्वा अर्चय़िष्यन्ति ये तु माम् ||
११४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सप्ताङ्गश्चक्रसङ्घातो राज्यमित्युच्यते नृप ||
१५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सप्ताङ्गश्चापि सङ्घातस्त्रय़श्चान्ये नृपोत्तम |
१५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
सप्ताङ्गस्य च राज्यस्य ह्रासवृद्धिसमञ्जसम् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सप्ताङ्गस्यास्य राज्यस्य त्रिदण्डस्येव तिष्ठतः |
१५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
सप्ताङ्गे यश्च ते राज्ये वैपरीत्यं समाचरेत् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
सप्तानां मरुतां लोकान्वसूनां चापि सोऽश्नुते |
१०५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
सप्तानां मरुतां श्रेष्ठो लोकान्गच्छति यः शुभान् |
७२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
सप्तानामपि यो नेता सेनानां प्रविभागवित् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
सप्तावरान्सप्त परान्पितॄंस्तेभ्यश्च ये परे |
६१ क
वन पर्व
अध्याय १८४
सरस्वत्यु उवाच
सप्तावरान्सप्त पूर्वान्पुनाति; पितामहानात्मनः कर्मभिः स्वैः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
सप्तावरे तथा पूर्वे वान्धवास्ते निपातिताः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४५
भीष्म उवाच
सप्तावरे महाघोरे निरय़े कालसाह्वय़े |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
व्राह्मण उवाच
सप्ताश्रमाः सप्त समाधय़श्च; दीक्षाश्च सप्तैतदरण्यरूपम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४७
नागभार्यो उवाच
सप्ताष्टदिवसास्त्वद्य विप्रस्येहागतस्य वै |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४५
नागभार्यो उवाच
सप्ताष्टभिर्दिनैर्विप्र दर्शय़िष्यत्यसंशय़म् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
सप्ताहं चन्द्रभागां वै वितस्तामूर्मिमालिनीम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय १२१
लोमश उवाच
सप्तैकैकस्य यूपस्य चषालाश्चोपरि स्थिताः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
सप्तैते परमक्रुद्धाः किरीटिनमभिद्रुताः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
सप्तैते मानसाः प्रोक्ता ऋषय़ो व्रह्मणः सुताः |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
सप्तैते वाय़ुमार्गा वै तान्निवोधानुपूर्वशः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
सप्तैव संहारमुपप्लवानि; सम्भाव्य सन्तिष्ठति सिद्धलोके |
५० क