विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
हीनातिरिक्तमेतेषां भीष्मो वेदितुमर्हति ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
हीनादादेय़मादौ स्यात्समानात्तदनन्तरम् |
३८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
हीनानां नस्त्वय़ा राजन्कुतः शान्तिः कुतः सुखम् ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
धृतराष्ट्र उवाच
हीनान्पुरुषकारेण मामकानद्य सञ्जय़ |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
हीनास्ते स्वगुणैः सर्वैः प्रेत्यावाङ्मार्गगामिनः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
युधिष्ठिर उवाच
हीने परमके धर्मे सर्वलोकातिलङ्घिनि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
युधिष्ठिर उवाच
हीने परमके धर्मे सर्वलोकातिलङ्घिनि |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
हीनय़ालक्षणैः सर्वैस्तथानिन्दितय़ा मय़ा |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
हीय़मानं तु तद्रक्षः समीक्ष्य भरतर्षभ |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
हीय़माने च कौन्तेय़े कृष्णं रोषः समभ्ययात् ||
१२१ ग
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
हीय़मानेन वै सन्धिः पर्येष्टव्यः समेन च |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
हुङ्कारैः क्ष्वेडितोत्क्रुष्टैः सिंहनादैः सगर्जितैः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
हुङ्कारैः सिंहनादैश्च तिष्ठ तिष्ठेति निस्वनैः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
हुडशक्तिगदाप्रासखड्गचर्मर्ष्टितोमरम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
हुडा भुशुण्ड्योऽश्मगुडाः शतघ्न्यः; स्थूणाश्च कार्ष्णाय़सपट्टनद्धाः |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
हुतं च होष्यमाणं च काले वेदय़ते सदा ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
हुतं यतोमुखैर्हव्यं सर्पते सर्वतोदिशम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
हुतं वहति यो हव्यमस्य लोकस्य पावकः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
हुतभुक्सर्वलोकेषु सर्वभक्षत्वमेष्यति ||
१६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
हुतमग्नौ च भद्रं ते दुर्योधनवशं गतम् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
भीष्म उवाच
हुताग्नय़ो जप्तजप्याः प्रतस्थुर्मज्जिघांसय़ा ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
हुताशनं नमस्कृत्य ततस्तदपि वीर्यवान् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
हुताशनमनुज्ञाप्य जगाम त्रिदिवं पुनः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
हुताशनमुखं दीप्तं प्रविष्टमिति सत्तम ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
हुताशनमुखं दीप्तं सूर्यचन्द्राक्षितारकम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
हुताशनमुखाश्चापि दीप्ताः पारिषदां गणाः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
हुताशनशिखेव त्वं ज्वलमाना स्वतेजसा |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
हुताशनसहाय़श्च प्रशान्तात्मा हुताशनः ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
हुताशनस्तु वुवुधे मण्डूकस्याथ पैशुनम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
हुताशनस्येव समिद्धतेजसः; स्थिरो भवस्वेह ममाद्य वन्दिन् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
हुताशनादित्यसमानतेजसं; पराक्रमे विष्णुपुरन्दरोपमम् |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
हुताशनाभः स हुताशनप्रभे; शुभः शुभे वै स्वरथे धनुर्धरः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
हुताशनार्चिप्रतिमाः सर्वास्तारा इवाद्भुताः ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
हुताशनेन दग्धश्च यस्तस्याः काष्ठसञ्चय़ः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
हुताशनेन यच्चापः प्रविश्य छन्नमासता |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
हुताशनो न तत्रासीच्छापकाले सुरोत्तमाः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
हुताहुतिरिव ज्योतिर्व्याप्य तेजोमरीचिभिः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
हुते प्रीतिकरीमृद्धिं भगवांस्तत्र मन्यते ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८४
भृगुरु उवाच
हुतेन शाम्यते पापं स्वाध्याय़े शान्तिरुत्तमा |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
हुत्वा चाहवनीय़स्थं महाभाग्ये प्रतिष्ठिताः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
हुत्वा तस्मिन्यज्ञवह्नावथारी; न्पापान्मुक्तो राजसिंहस्तरस्वी |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
राजन्य उवाच
हुत्वा प्राणान्प्रमोक्षस्ते नान्यथा मोक्षमर्हसि ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
हुत्वा रणमुखे प्राणान्गतिमिष्टामवाप ह ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
हुत्वा शतसहस्रं स सावित्र्या राजसत्तम |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
हुत्वा शरीरं सङ्ग्रामे कृत्वा कर्म सुदुष्करम् |
३६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
हुत्वाग्निं विधिवत्सर्वे प्रय़युस्ते यथाक्रमम् |
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
हुत्वाग्निं विधिवद्विप्रान्वाचय़ामास पर्वणि ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
हुत्वाग्निं व्राह्मणान्निष्कैः स्वस्ति वाच्य महाभुजः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
हुत्वाग्नौ देहमुत्सृज्य वह्निलोके महीय़ते ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
हुत्वात्मानममित्राग्नौ प्राप चावभृथं यशः ||
२५ ख