सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
हूय़माना यथा यज्ञे समिद्धा हव्यवाहनाः ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
हूय़माने तथा वह्नौ होत्रे वहुगुणान्विते |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
हूय़माने भृशं दीप्ते विधिवत्पावके तदा |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
हृच्छय़ः सर्वभूतानां ज्येष्ठो रुद्रादपि प्रभुः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
हृच्छय़ेन समाविष्टो विचेताः समपद्यत ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
हृतं पुरा मे श्वशुरस्य धीमतः; स्वमेव राज्यं स लभेत पार्थिवः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
हृततेजोवलाः सर्वे तदा सेन्द्रा दिवौकसः |
५० क
वन पर्व
अध्याय
१४७
हनूमानु उवाच
हृतदारः सह भ्रात्रा पत्नीं मार्गन्स राघवः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
हृतदारस्य मे राजन्हृतराज्यस्य च त्वय़ा |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
हृतदारो महासत्त्वो रामो दशरथात्मजः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
हृतदारो हृतधनो व्रूहि कस्मान्न शोचसि ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
हृतदारोऽवधूतश्च नाहं जीवितुमुत्सहे ||
३५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
हृतभूय़िष्ठरत्नस्य कुरुक्षेत्रमवातरत् ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
हृतमैश्वर्यमस्माकं जीवतां भवतः कृते ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
हृतराज्यं नलं राजन्प्रहसन्पुष्करोऽव्रवीत् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
हृतराज्यं हृतधनं विवस्त्रं क्षुच्छ्रमान्वितम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
हृतराज्ये नले भीमः सभार्ये प्रेष्यतां गते |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
हृतराज्यो वने वासं वस्तुं कृतमतिस्ततः |
२७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
हृतराज्यो हतसुहृद्धतचक्षुश्च वै तथा |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
हृतस्वं कामिनं चोरमाविशन्ति प्रजागराः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
हृतस्वं व्यसनार्तं च नित्यमाश्वासय़न्ति ते ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
हृतस्ववलराज्यस्त्वं व्रूहि कस्मान्न शोचसि ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
कश्यप उवाच
हृतस्वस्य हि यद्दुःखं हतपुत्रस्य चापि यत् |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
हृतस्वा मानिनो ये च त्यक्तोपात्ता महेप्सवः ||
७४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
हृतस्वा हृतदाराश्च ये विप्रा देशसम्प्लवे |
५४ क
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
हृतस्वान्भ्रष्टचित्तांस्तान्हृतदारान्हृतश्रिय़ः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
हृता गौः सा तदा तेन प्रपातस्तु न तर्कितः ||
२७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
हृताः सर्वाः शरौघैस्तैः कर्णमाधवय़ोस्तदा ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
हृते धने ततः शर्म न लेभे धनदस्तथा |
१० क
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
हृते पशौ तदा देवास्तमूचुर्भरतर्षभ |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
हृतेन राज्येन तथा धनेन; रत्नैश्च मुख्यैर्न तथा वभूव |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
हृतो राजा हृतो राजा भारद्वाजेन मारिष |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
हृतो राजेति योधानां समीपस्थे यतव्रते ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
हृतो राजेति राजेन्द्र व्राह्मणेन यशस्विना ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
हृतोत्तमाङ्गं शकुनिं समीक्ष्य; भूमौ शय़ानं रुधिरार्द्रगात्रम् |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
हृतोत्तमाङ्गमाशुत्वात्सहदेवेन वुद्धवान् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
हृतोत्तमाङ्गाः केचित्तु तथैवोद्यतकार्मुकाः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
हृतोत्तमाङ्गाः स्कन्धेषु गजानां गजय़ोधिनः |
४० क
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
हृतोत्तमाङ्गैर्निहतैः करोतु; कीर्णां कुशैर्वेदिमिवाध्वरेषु ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
हृतोत्तमाङ्गो ददृशे वातरुग्ण इव द्रुमः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
हृतोत्तमाङ्गो युधि पाण्डवेन; पपात भूमौ सुवलस्य पुत्रः ||
५८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
हृतोत्तमाङ्गो युधि सात्वतेन; पपात भूमौ सह नागराज्ञा |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
हृतोऽस्म्यर्थेन कौरव्य युद्धादन्यत्किमिच्छसि ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
हृत्वा तु काञ्चनं भाण्डं कृमिय़ोनौ प्रजाय़ते |
१०० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
हृत्वा पैष्टमपूपं च कुम्भोलूकः प्रजाय़ते |
९८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
हृत्वा रक्तानि वस्त्राणि जाय़ते जीवजीवकः ||
१०२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
हृदि कामद्रुमश्चित्रो मोहसञ्चय़सम्भवः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
हृदि कामस्तु मे कश्चित्तं निवोध जनेश्वर ||
४७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
धृतराष्ट्र उवाच
हृदि कृत्वा महावाहुर्भीमोऽय़ुध्यत सूतजम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९९
नारद उवाच
हृदि चैषां सदा विष्णुर्विष्णुरेव गतिः सदा ||
८ ख