द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
वासुदेव उवाच
हृदि नित्यं तु कर्णस्य वधो गाण्डीवधन्वनः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
सञ्जय़ उवाच
हृदि नित्यं महावाहो वक्तुमर्हसि तन्मम ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
हृदि मानुष्यकं भावं चक्रे युद्धाय़ सुस्थिरम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
हृदि यच्चास्य जिह्मं स्यात्कारणार्थं च यद्भवेत् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
हृदि विव्याध वाणेन स भिन्नहृदय़ोऽपतत् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
हृदि विव्याध वेगेन तोत्त्रैरिव महाद्विपम् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
हृदि विव्याध स तदा रथोपस्थ उपाविशत् ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
हृदि विव्याध सङ्क्रुद्धः कङ्कपत्रपरिच्छदैः ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
हृदि स्थितः कर्मसाक्षी क्षेत्रज्ञो यस्य तुष्यति ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
हृदिस्थचेतनाधातुर्मनोज्ञाने विधीय़ते ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
हृद्गतं चास्य विज्ञाय़ दर्शय़ामास शङ्करः ||
१३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
हृद्गतं मनसा प्राह ध्यात्वा धर्मभृतां वरः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
हृद्गतस्तस्य यः कामस्तं कुरुध्वमतन्द्रिताः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
हृद्यविध्यत्पृषत्केन प्रहसन्निव पाण्डवः ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
हृद्यश्चोदरशाण्डिल्यः पाराशर्यः कृषीवलः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
हृद्येष तिष्ठन्पुरुषः शास्ति शास्ता; तेनैव युक्तः प्रवणादिवोदकम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
हृदय़ं चरणश्चापि वामोऽस्य परिवर्तते |
४५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
हृदय़ं चिन्तय़ेच्चापि तथा हृदय़वन्धनम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
हृदय़ं तत्र जानाति कर्तुश्चैव कृतस्य च ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
७१
दमय़न्त्यु उवाच
हृदय़ं दीर्यत इदं शोकात्प्रिय़विनाकृतम् ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
हृदय़ं निर्दहन्मेऽद्य रात्र्यहानि न शाम्यति ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
हृदय़ं पापवृत्तानां पापमाख्याति वैकृतम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
हृदय़ं प्रिय़ाप्रिय़े वेद त्रिविधा कर्मचोदना ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
हृदय़ं भीमसेनस्य घट्टय़न्तीदमव्रवीत् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
७९
सहदेव उवाच
हृदय़ं मे महाराज न शाम्यति कदाचन ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
७२
वृहदश्व उवाच
हृदय़ं व्यथितं चासीदश्रुपूर्णे च लोचने ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
हृदय़ं सर्वभूतानां क्षेत्रज्ञस्त्वमृषिष्टुतः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
हृदय़ं सर्वभूतानां पर्वणोऽङ्गुष्ठमात्रकः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
हृदय़ं सर्वभूतानां महानात्मा प्रकाशते ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
हृदय़ग्रहणीय़ानि राधेय़ं मधुसूदनः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
शकुनिरु उवाच
हृदय़ज्ञः पणज्ञश्च विशेषज्ञश्च देवने ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
हृदय़सुखमसेवितं कदर्यै; र्व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
हृदय़स्थोऽन्तरात्मेति ज्ञेय़ो ज्ञस्तात मद्विधैः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
हृदय़स्य च मे प्रीतिरानृण्यं च भविष्यति ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
हृदय़े शल्यभूतानि धारय़ामि सहस्रशः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
हृदय़ेन महाराज पुण्यश्लोकस्य सारथिः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
हृदय़ेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं व्यवस्यति ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
हृदय़ेनावहस्यैनं हनूमान्वाक्यमव्रवीत् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
वैशम्पाय़न उवाच
हृदय़ेनोद्वहन्भारं यदुक्तं परमात्मना ||
२० ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
हृदय़ैः शून्यभूतैस्ते धृतराष्ट्रप्रवासजम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
हृषितस्रग्रजोहीनान्स्थितानस्पृशतः क्षितिम् ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
हृषितानि च रोमाणि कश्मलं चागतं मम ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
हृषीकेशमवज्ञानात्तमाहुः पुरुषाधमम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
हृषीकेशोऽहमीशानो वरदो लोकभावनः ||
२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
हृषीविदर्भाः कान्तीकास्तङ्गणाः परतङ्गणाः |
६३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
हृष्ट एको जघानाश्वं भल्लेन कृतवर्मणः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
हृष्टं प्रमुदितं सर्वं दैत्यानामभवत्पुरम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
हृष्टः कन्यामुपादाय़ नगरं नागसाह्वय़म् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
हृष्टः पर्यपतद्राजन्दुर्योधनवधेप्सय़ा ||
५ ख