आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टः प्रमुदितश्चापि प्रतिजग्राह तं सुतम् ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टः प्रीतमनाश्चैव ह्यभवन्माधवोत्तमः ||
९४ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टः श्रुत्वा नरपतेराय़ान्तं सव्यसाचिनम् ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टः सम्पूजय़ामास गुडाकेशश्च पाण्डवः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टः सम्पूजय़ामास तद्वाक्यममृतोपमम् ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
हृष्टः सम्पूजय़ामास वचनं चेदमव्रवीत् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टः सह भ्रातृभिरर्जुनस्य; सङ्कीर्तय़ामास गवां प्रदानम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
हृष्टः सान्तःपुरो राजा वननित्योऽभवत्तदा ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
हृष्टपुष्टजनाकीर्णां नित्योत्सवसमाकुलाम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
हृष्टरूपप्रचारत्वाद्दण्डः सोऽन्तर्हितोऽभवत् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टरूपा महात्मानो विनाशाय़ महीक्षिताम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टरूपाः सुमनसो वभूवुः सहसैनिकाः ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टरूपोऽभवद्राजा सह भ्रातृभिरच्युतः ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टरोमा भय़ोद्विग्नः क्षणेन समपद्यत ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टरोमा भय़ोद्विग्नः पार्थं वैराटिरव्रवीत् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
हृष्टरोमा महाराज प्रत्युवाच जनार्दनम् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
हृष्टलोमा च वश्यात्मा नमस्कृत्य महर्षय़े |
९२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
हृष्टवत्सम्प्रजह्राते व्याघ्रकेसरिणाविव ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
हृष्टवद्धार्तराष्ट्राणां पश्यतामभ्यवर्षताम् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
हृष्टसेनाः सुसंरव्धा रथानीकैः प्रहारिणः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
हृष्टस्य रेतश्चस्कन्द तदृषिर्द्रोण आदधे ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
हृष्टा ग्रहीतुं खगमांस्त्वरमाणोपचक्रमे ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
हृष्टा दुर्योधनं दृष्ट्वा निहतं पुरुषर्षभाः ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
हृष्टा योधाः सत्त्ववन्तो भवन्ति; जय़स्यैतद्भाविनो रूपमाहुः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
हृष्टा वाचस्तथा सत्त्वं योधानां यत्र भारत |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
हृष्टा विनिर्ययुस्ते वै युधिष्ठिरनिवेशनात् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
हृष्टाः किलकिलाशव्दमकुर्वन्तापरे तथा ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
हृष्टाः किलकिलाशव्दमकुर्वन्सहिताः परे ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टाः परिपतन्ति स्म महापारिषदास्तथा ||
९८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
हृष्टाः पुरुषशार्दूलाः कलुषीकृतमानसाः |
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टाः सम्पूजय़ामासुः पार्थमक्लिष्टकारिणम् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
हृष्टाः सुमनसश्चैव वभूवुस्तत्र सैनिकाः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
हृष्टाः सुमनसो भूत्वा चैलानि दुधुवुः पृथक् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टात्मा नैमिषारण्यं जगाम पुनरेव हि ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२०
मार्कण्डेय़ उवाच
हृष्टानां तत्र भूतानां श्रूय़ते निनदो महान् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टानां तत्र योधानां शव्दो दिवमिवास्पृशत् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
हृष्टानां धार्तराष्ट्राणां सिंहनादो मय़ा श्रुतः |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टानां सम्प्रय़ातानां घोषो दिवमिवास्पृशत् ||
५१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टानां सिंहनादेन जनानां तत्र निस्वनः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
हृष्टावाद्रवतां भीष्मं श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
हृष्टाश्च वहवो योधास्तत्राजल्पन्त सङ्गताः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
हृष्टाश्चासंस्तदा योधा मद्रकाश्च महारथाः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टास्तुष्टाः कवचिनः सशस्त्राः समलङ्कृताः |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
हृष्टेन मनसा दत्तं न स तिर्यग्गतिर्भवेत् ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
हृष्टेन राजन्कुरुपार्थिवस्य; क्षुद्रात्मना भीमसेनेन पादम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टैस्तथा तामरसरसासवमदालसैः |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
हृष्टो दुर्योधनश्चापि दृढमादाय़ कार्मुकम् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
हृष्टो दुर्योधनो राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टो भूत्वा पुनर्दीन इदं वचनमव्रवीत् ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्टोऽभवद्धृषीकेशः साधु साध्विति चाव्रवीत् ||
७ ख