chevron_left  हृष्टोऽव्रवीन्महातेजास्तौarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
हृष्टोऽव्रवीन्महातेजास्तौ नासत्याविदं वचः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भरद्वाज उवाच
हृष्यति क्रुध्यति च कः शोचत्युद्विजते च कः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
हृष्यन्ति रोमकूपानि सीदतीव च मे मनः |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
हृष्यमाण इदं वाक्यं द्रौणिं प्रत्यव्रवीत्तदा ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
हे मित्रहन्पाप इति व्रुवाणं शक्रमन्तिकात् ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
हे सुषेण हतोऽसीति व्रुवन्नादत्त साय़कम् |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
हेतुः स एवानादाने शुद्धधर्मानुपालने ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
हेतुकारणसंय़ुक्तं हितं वचनमुत्तमम् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
हेतुकारणसंय़ुक्तैर्वाक्यैः कालसमीरितैः ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
हेतुकारणसंय़ुक्तैर्वाक्यैराश्वासय़त्प्रभुः ||
६५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
हेतुना तु महाभागा निवर्तिष्यति केनचित् ||
६६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
हेतुनानेन कौन्तेय़ जगद्विपरिवर्तते ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय २०१
पितामह उवाच
हेतुनानेन दैत्येन्द्रौ न वां कामं करोम्यहम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
हेतुभिः कारणैश्चैव यथा यज्ञो भवेन्न सः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
उमो उवाच
हेतुभिर्यैर्ममैतानि रूपाणि रुचिरानने ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
हेतुभिर्वा किमन्यैस्ते ईशः कारणकारणम् |
१०० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
हेतुमच्चैतदुद्दिष्टमुपाय़ाश्चास्य साधने |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
हेतुमच्छक्यमाख्यातुमेतावज्ज्ञानचक्षुषा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
हेतुमत्र प्रवक्ष्यामि तदिहैकमनाः शृणु ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
हेतुमद्ग्रहणीय़ं च कालाकाङ्क्षी व्यपैक्षत ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
हेतुमद्ग्रहणीय़ार्थं मार्जारो वाक्यमव्रवीत् ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११४
भीष्म उवाच
हेतुमद्ग्राहकं चैव सागरं सरितां पतिम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
हेतुमागमने तस्य द्रोणः सर्वं न्यवेदय़त् ||
२३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
हेतुमात्रमिदं तस्य कालस्य पुरुषर्षभ |
६ क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
हेतुमात्रमिदं धातुः शरीरं क्षेत्रसञ्ज्ञितम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
हेतुवादान्प्रवदिता वक्ता संसत्सु हेतुमत् |
४६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
हेतुवादान्वहून्प्राहुः परस्परजिगीषवः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
हेतुवादान्व्रुवन्सत्सु विजेताहेतुवादिकः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
हेतुय़ुक्तः सदोत्सर्गो भूतानां प्रलय़स्तथा |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
हेतुय़ुक्तमतः सर्वं जगत्सम्परिवर्तते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
हेतुय़ुक्ताः प्रकृतय़ो विकाराश्च परस्परम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
हेतूनामन्तमासाद्य विपुलं ज्ञानमुत्तमम् |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
हेतून्हेतुशतैश्चित्रैश्चित्रान्विज्ञाय़ तत्त्वतः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
हेत्वागमसदाचारैर्यदुक्तं तदुपास्यते ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
हेमकक्षाः कृतापीडाः पद्मिनो हेममालिनः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
हेमकक्ष्याध्वजोपेतं कॢप्तय़न्त्रपताकिनम् |
८४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
हेमकूटस्तु सुमहान्कैलासो नाम पर्वतः |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
हेमकूटात्परं चैव हरिवर्षं प्रचक्षते ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
हेमचित्रसमुत्सेधां सर्वशैक्याय़सीं गदाम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
हेमचित्रा महाराज द्योतय़न्तो दिशो दश ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
हेमचित्रां महावेगां नागकन्योपमां शुभाम् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
हेमचित्राणि शूराणां महान्ति च शुभानि च ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
हेमजालविचित्रेण लघुना मेघनादिना ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
हेमतालध्वजं भीष्मं राजते स्यन्दने स्थितम् |
४१ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
उत्तर उवाच
हेमत्सरुरनाधृष्यो नैषध्यो भारसाधनः ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
हेमदण्डधरो राजन्कमण्डलुधरस्तथा ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
हेमदण्डप्रतिच्छन्नं रथं युक्तं च सुव्रजैः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
हेमदण्डोच्छ्रितच्छत्रे वहुशस्त्रपरिच्छदे |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
हेमन्तकाले सलिलं तडागे यस्य तिष्ठति |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
हेमन्तान्तेऽशोक इव रक्तस्तवकमण्डितः |
३१ क