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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
सुग्रीवय़ुक्तेन रथेन वा ते; पश्चात्कृष्णो रक्षतु वासुदेवः ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
सुघोरं तलय़ोः शव्दं निघ्नतस्तव वाहिनीम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
सुघोरमभवद्युद्धं त्वदीय़ानां परैः सह ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सुघोरमशिवं रौद्रं नाशय़न्ति च पावकम् ||
७२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
सुघोषः पतगेन्द्रेण ध्वजेन युय़ुजे रथः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
सुघोषैर्मधुरैः शव्दैः सुप्तः स प्रतिवोध्यते ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
सुचक्रोपस्करं धीमान्हेमभाण्डपरिष्कृतम् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
सुचक्रोपस्करः श्रीमान्किङ्किणीजालमण्डितः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
सुचन्द्रं चन्द्रहन्तारं तथा चन्द्रविमर्दनम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
सुचारुवर्णाक्षरशव्दभूषितां; मनोनुगां निर्धुतवाक्यकण्टकाम् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
सुचारुवेषाभिरलङ्कृताभि; र्मदोत्कटाभिः प्रिय़वादिनीभिः |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
सुचित्रश्चित्रधर्मा च पितापुत्रौ महारथौ |
७८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
सुचित्रे जीवलोकेऽस्मिन्नुपास्यः कालपर्ययात् ||
७१ ख
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
सुचिरं पुरुषव्याघ्रं तस्थौ साश्रुपरिप्लुता ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
सुचिरं प्रार्थितो ह्येष मम नित्यं मनोरथः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
सुचिरं वत सुप्तोऽसि ममाङ्के पुरुषर्षभ |
६४ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
सुचिरं वत सुप्तोऽस्मि किमर्थं नाववोधितः |
६३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
सुचिरादपि भीमस्य न हि वैरं प्रशाम्यति |
८३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
दुर्योधन उवाच
सुचेतसो महेष्वासानिन्द्रोऽपि सहितोऽमरैः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
सुचेतसौ वलिनौ शीघ्रहस्तौ; सुशिक्षितौ भ्रातरौ फल्गुनेन |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
सुजत्रुः सुविशालाक्षः सुपादः सुप्रतिष्ठितः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सुजातौ मृदुरक्ताभिरङ्गुलीभिरलङ्कृतौ ||
११९ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
सुजातय़ः श्रेणिमन्तः श्रेय़ांसः शस्त्रपाणय़ः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
सुजिह्मं प्रेक्षमाणौ च राजन्विवृतलोचनौ |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
सुतं च स्थापय़ेद्राजा प्राज्ञं सर्वार्थदर्शिनम् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
सुतं तेऽग्र्यं प्रदास्यामि सर्वामित्रविनाशनम् ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
सुतं पश्यस्व तस्येमं व्रह्मास्त्रेण निपातितम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
सुतप्तं वस्तपो देवा ममाराधनकाम्यया |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
सुतप्तं वस्तपो विप्राः प्रसन्नेनान्तरात्मना ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
सुतसोमं च विंशत्या वाह्वोरुरसि चार्पय़त् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
सुतसोमं तु यं धौम्यात्पार्थः पुत्रमय़ाचत |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
सुतसोमं तु विक्रान्तमापतन्तं शरौघिणम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
सुतसोमं महेष्वासं सुषुवे भीमसेनतः ||
७५ ख
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
सुतसोमं वृकोदरः |
८२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
सुतसोमश्च नवभिः शतानीकश्च सप्तभिः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
सुतसोमस्ततोऽगच्छच्छ्रुतकीर्तेर्महारथम् ||
३६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
सुतसोमस्तु तं दृष्ट्वा पितुरत्यन्तवैरिणम् |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
सुतसोमस्तु शकुनिं विव्याध निशितैः शरैः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
सुतसोमस्तु सङ्क्रुद्धः स्वपितृव्यमजिह्मगैः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
सुतसोमस्य तत्कर्म दृष्ट्वाश्रद्धेय़मद्भुतम् |
२५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
सुतसोमस्य सासिं तु वाहुं छित्त्वा नरर्षभः |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
सुतसोमो विकर्णं च तदद्भुतमिवाभवत् ||
५६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
सुतसोमोऽभिदुद्राव परीप्सन्पितरं रणे ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
सुतस्तवाव्रवीद्राजन्सारथिं रथिनां वरः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
सुतस्त्रिय़ा च शय़नं सहभोज्यं च वर्जय़ेत् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
सुतस्य राजा धृतराष्ट्रः प्रिय़ैषी; प्रपश्यमानः प्रजहाद्धर्मकामौ ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
सुतस्य राजा धृतराष्ट्रः प्रिय़ैषी; सम्वुध्यमानो विशतेऽधर्ममेव ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
सुतस्यैतदिह प्रोक्तं दशमं पर्व सौप्तिकम् ||
१८८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
सुता ताराधिपस्येव प्रभय़ा दिवमागता ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
सुता द्रुपदराजस्य वेदिमध्यात्समुत्थिता |
२१ क