chevron_left  ह्रीरहिंसाव्यसनिताarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
ह्रीरहिंसाव्यसनिता दाक्ष्यं चेति सुखावहाः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
ह्रीर्हता वाधते धर्मं धर्मो हन्ति हतः श्रिय़म् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
ह्रीश्च क्रोधश्च वीभत्सुं क्षणेनान्वविशच्च ह ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
ह्रीश्चैवाप्यनशद्राजंस्ततो मोहो व्यजाय़त ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
ह्लादते जनिता प्रेष्क्य स्वर्गं प्राप्येव पुण्यकृत् ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
ह्लादनार्थं शरीरस्य प्रय़च्छापो ममार्जुन |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
ह्लादन्ते स्वेषु दारेषु घर्मार्ताः सलिलेष्विव ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
ह्लादय़न्पाण्डवान्सर्वान्सकृष्णान्सद्विजर्षभान् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
ह्लादय़न्सर्वगात्राणि गौतमस्य तदा नृप ||
१५ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
ह्लादय़ामास स विभुर्घर्मार्तं सलिलैरिव ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
हय़ं नय़स्व भद्रं ते यज्ञिय़ं नरपुङ्गव |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
हय़ं वा दन्तिनं वापि रथं नृपतिसंमतम् |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
हय़ग्रीवो विदेहानां वरप्रश्च महौजसाम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
हय़ज्ञश्चोदय़ामास जय़द्रथरथं प्रति ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
हय़ज्ञानस्य लोभाच्च तथेत्येवाव्रवीद्वचः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
हय़नागरथावर्तां महाघोरां सुदुस्तराम् |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
हय़पत्तिलताकीर्णं गाहमानो महाय़शाः |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
हय़प्रवेकोत्तमनागधूर्गता; न्कुरुप्रवीरानिषुभिर्न्यपातय़त् ||
८७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
हय़मुत्सृज्य तं वीरस्ततः पार्थमुपाद्रवत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
हय़मेधमवाप्नोति शक्रलोकं च गच्छति ||
१३२ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
हय़मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति तत्र वै ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
महेश्वर उवाच
हय़मेधेन यजते तत्र यान्ति दिवौकसः ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
हय़मेनं हरिष्यामि प्रय़तस्व विमोक्षणे ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
हय़योधानपश्याम कञ्चुकोष्णीषधारिणः ||
१०९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
हय़वारणमुख्याश्च प्रापतन्त सहस्रशः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
हय़वारणशव्दश्च नेमिघोषश्च सर्वशः |
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
हय़श्च हय़मेधार्थं स्वय़ं स व्रह्मवादिना |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
हय़स्य पुरुषाः सप्त भिन्नसन्धानकारिणः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
हय़स्यन्दननागेभ्यः पेतुर्वीरा द्विषद्धताः |
७ क
वन पर्व
अध्याय १०६
सगर उवाच
हय़स्यानय़नात्पौत्र नरकान्मां समुद्धर ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
हय़हेषितशव्दाश्च वारणानां च वृंहितम् |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
हय़हेषितशव्दैश्च रथनेमिस्वनैस्तथा ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
हय़ा गजाः पदाताश्च विमिश्रा दन्तिभिर्हताः |
७३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
हय़ा गजैः समाजग्मुः पादाता रथिभिः सह |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
हय़ा जग्मुर्महावेगा मनोमारुतरंहसः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
हय़ा मम महाराज वेपमाना इवाभवन् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
हय़ा रथाश्च नागाश्च कोटिशः पुरुषास्तथा |
१२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
हय़ा हय़ांश्च समरे रथिनो रथिनस्तथा |
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
हय़ा हय़ान्समासाद्य प्रेषिता हय़सादिभिः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
हय़ा हय़ैः समाजग्मुः पादाताश्च पदातिभिः |
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
हय़ा हय़ैः समासक्ता रथिनो रथिभिस्तथा |
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
हय़ांश्च चतुरः शीघ्रं निजघान महारथः |
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
हय़ांश्च चतुरः सङ्ख्ये प्रेषय़ामास मृत्यवे ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
हय़ांश्च चतुरस्तूर्णं चतुर्भिः साय़कोत्तमैः ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
हय़ांश्च चतुरोऽविध्यच्चतुर्भिर्निशितैः शरैः ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
हय़ांश्च नागांश्च रथांश्च युध्यतां; धनञ्जय़ः शत्रुगणं तमक्षिणोत् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
हय़ांश्च नागांश्च रथांश्च शीघ्रं; पदातिसङ्घांश्च ततः प्रवीरान् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
हय़ांश्च नानाविधदेशजाता; न्यानानि दासीश्च तथा द्विजेभ्यः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
हय़ांश्चकार निर्देहानुभौ च पार्ष्णिसारथी ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
हय़ांश्चकार निर्देहान्सारथेश्च शिरोऽहरत् ||
१७ ख