सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धस्य तस्य स्रोतोभ्यः सर्वेभ्यः पावकार्चिषः |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धस्य नरसिंहस्य सङ्ग्रामेष्वपलाय़िनः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धस्य प्रमुखे स्थातुं पर्याप्ता इति मारिष ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
भगवानु उवाच
क्रुद्धस्य प्रमुखे स्थातुं सिंहस्येवेतरे मृगाः ||
८६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
क्रुद्धस्य प्रमुखे स्थातुं सिंहस्येवेतरे मृगाः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
धृतराष्ट्र उवाच
क्रुद्धस्य भिमसेनस्य यस्तिष्ठेदग्रतो रणे ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धस्य भीमसेनस्य प्रेक्षितुं मुखमाहवे ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
धृतराष्ट्र उवाच
क्रुद्धस्य भीमसेनस्य मम पुत्राञ्जिघांसतः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
धृतराष्ट्र उवाच
क्रुद्धस्य युय़ुधानस्य सर्वे तिष्ठन्तु पाण्डवाः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धस्याशीविषस्येव च्छिन्नपुच्छस्य भारत ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
क्रुद्धा अपि मुनिश्रेष्ठं वीक्षितुं नैव शक्नुमः ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धा इव मनुष्येन्द्र भुजगाः कालचोदिताः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धा मनस्विनी भार्या विविक्ते हेतुमद्वचः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धा व्रुवन्तोऽनुय़युर्द्रुतं ते; शस्त्राणि चोद्यम्य विवृत्तनेत्राः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
क्रुद्धाँल्लुव्धान्परिक्षीणानवक्षिप्तान्विमानितान् |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धाः क्रुद्धैर्महामात्रैः प्रेषितार्जुनमभ्ययुः ||
९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धाः सहस्रशो राजञ्शिखिता हस्तिसादिनः ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
क्रुद्धादमर्षणात्तात व्याघ्रादिव महारुरोः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
यय़ातिरु उवाच
क्रुद्धादाशीविषात्सर्पाज्ज्वलनात्सर्वतोमुखात् |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धाद्वापि प्रसन्नाद्वा किं मे त्वत्तो भविष्यति ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धानां युध्यमानानां जय़तां जीय़तामपि ||
३६ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
क्रुद्धाममर्षितां कृष्णां दुःखितां कुरुसंसदि |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धाशीविषसङ्काशां प्रेषय़ामास भारत ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धाशीविषसङ्काशान्सुकुमारान्सुखोचितान् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
क्रुद्धे चास्मिन्हसन्त्येव न च हृष्यन्ति पूजिताः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
४६
धृतराष्ट्र उवाच
क्रुद्धे पार्थे च भीमे च वासुदेवे च सात्वते ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धे शान्तनवे भीष्मे द्रोणे च रथसत्तमे ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
क्रुद्धेन च महाभागे हैहय़ाधिपतिर्हतः |
१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धेन द्रोणपुत्रेण सञ्छिन्नाः प्रापतन्भुवि ||
११४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धेन नरसिंहेन भीमसेनेन वारिताः ||
७५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धेन पार्थेन तदाशु सृष्टं; वधाय़ कर्णस्य महाविमर्दे ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धेन भीमसेनेन पादेन मृदितं शिरः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धेन भीमसेनेन भ्राता दुःशासनस्तव ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
क्रुद्धेनाङ्गिरसा शप्तो गुणैरेतैर्विवर्जितः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
क्रुद्धेनैषीकमवधीद्येन गर्भं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१५४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धेनोशनसा शप्तो यय़ातिर्नाहुषस्तदा |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
क्रुद्धेव भूत्वा च पुनर्यथावदनुदर्शिताः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
क्रुद्धैर्हि विप्रैः कर्माणि कृतानि वहुधा नृप ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
क्रुद्धो दण्डान्प्रणय़ति विविधान्स्वेन तेजसा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
क्रुद्धो दशार्धेन हि ताडय़ेद्वा; स पांसुभिर्वापकिरेत्तुषैर्वा |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धो दुर्योधनोऽभ्येत्य प्रत्यविध्यच्छितैः शरैः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
क्रुद्धो न चैव प्रहरेत धीमां; स्तथास्य तत्पाणिपादं सुगुप्तम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धो नाम महाय़ोगी प्रचस्कन्द महारथात् |
५३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धो भृशं तव पुत्रेषु राज; न्दैत्येषु यद्वत्समरे महेन्द्रः ||
४२ ग
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
क्रुद्धो हि कार्यं सुश्रोणि न यथावत्प्रपश्यति |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४३
युधिष्ठिर उवाच
क्रुद्धोऽपि पुरुषव्याघ्र भीम मा स्म स्त्रिय़ं वधीः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धोऽर्जुनोऽभिदुद्राव व्याक्षिपन्गाण्डिवं धनुः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धौ तौ तु नरव्याघ्रौ वेगवन्तौ वभूवतुः |
९० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धौ संरम्भरक्ताक्षौ व्यभ्राजेतां महाद्युती ||
८८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धय़ोः साय़कमुचोर्यमान्तकनिकाशय़ोः ||
५ ख