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कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
हतशेषास्तु ये वीराः पाञ्चालानां महारथाः |
११९ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
हतशेषेष्वनीकेषु किमकुर्वत मामकाः ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
हतशेषैर्महाराज हतानां च सुतैरपि ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
हतशेषौ तदा सङ्ख्ये वाजिमध्ये व्यवस्थितौ ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७
शल्य उवाच
हतश्च नहुषः पापो दिष्ट्यागस्त्येन धीमता |
२० ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
हतसारथय़स्तत्र व्यकृष्यन्त तुरङ्गमैः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
हतसूतरथेनाजौ व्यचरद्यदभीतवत् ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
हतसूतहय़ं चक्रे विरथं साय़कोत्तमैः ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
हतसूता हय़ास्तस्य रथमादाय़ भारत |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४
नारद उवाच
हतसूतांश्च भूय़िष्ठानवजिग्ये नराधिपान् ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
हतसूते हताश्वे च विरथे कृतवर्मणि ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
हतस्तथैव माय़ावी हैडिम्वेनाप्यलाय़ुधः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
हतस्तदर्थे मरणं गमिष्यामि सवान्धवः ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
वासुदेव उवाच
हतस्त्वमसि गान्धारे सभ्रातृसुतवान्धवः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
हतस्य कर्तुमिच्छन्ति तस्य लोकाञ्शृणुष्व मे ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
हतस्य च हृषीकेश समौ जय़पराजय़ौ ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
हतस्य नरकस्यात्मा कर्णमूर्तिमुपाश्रितः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
हतस्य पततो हस्ताद्वेगेन न्यपतद्भुवि ||
३० ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
हतस्य समरे भर्तुः सुकुमारी यशस्विनी ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
हतस्यापचितिं भ्रातुश्चिकीर्षुर्युद्धदुर्मदः ||
६० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
हतस्याभिमुखस्याजौ प्राप्तस्त्वमसि तां गतिम् ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
हता उदीच्या निहताः प्रतीच्याः; प्राच्या निरस्ता दाक्षिणात्या विशस्ताः |
९६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
हता द्रोणेन विक्रम्य यन्मां त्वं परिपृच्छसि ||
८७ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
हता निपतिता भूमौ न मुञ्चन्ति परस्परम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
हता मदर्थं सङ्ग्रामे युध्यमानाः किरीटिना ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
हता माय़ाविनश्चोग्रा धनुः प्राप्तं च गाण्डिवम् ||
२० ग
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
धृतराष्ट्र उवाच
हता मे वहवो योधा मन्ये कालस्य पर्ययम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
हता वा देवसाद्भूत्वा लोकान्प्राप्स्यथ पुष्कलान् ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
हता वै स्त्रीस्वभावेन शुद्धचारित्रभूषणम् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
हता ससर्ववीरा हि भीष्मद्रोणौ यदा हतौ ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
हता हता वै ते तत्र जीवन्त्याप्लुत्य दानवाः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
हतांश्च नागांस्तुरगान्पदाती; न्संस्यूतदेहान्ददृशू रथांश्च ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
हतांश्च योधान्सन्दृश्य मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
हतांश्चाधर्मतः श्रुत्वा शोकार्ताः शुशुचुर्हि ते |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
धृतराष्ट्र उवाच
हतांश्चैव विषक्तांश्च पराभूतांश्च शंससि |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
धृतराष्ट्र उवाच
हतांश्चैव विषण्णांश्च विप्रकीर्णांश्च शंससि |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३
युधिष्ठिर उवाच
हताः पुत्राश्च पौत्राश्च भ्रातरः पितरस्तथा |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
हताः पेतुर्महानागाः साग्निज्वाला इवाद्रय़ः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
हताः शूराः कृतं पापं विषय़ः स्वो विनाशितः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
हताः सहस्रशो राजन्यन्मां त्वं परिपृच्छसि |
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
हतानवाकीर्य शरक्षतांश्च; लालप्यमानांस्तनय़ान्पितॄंश्च ||
४४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
हतानां यदि जानीषे परिमाणं वदस्व मे ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
हतानां वदनान्यासन्गात्राणि च महामते ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
हतानां वा मृतानां वा यथा हन्ता तथैव सः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
हतानां वाजिनागानां रथानां च नरैः सह |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
हतानामपविद्धानि कलापाश्च महाधनाः ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
हतानि च विकीर्णानि शरीराणि शरीरिणाम् ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
हतानीय़ुर्महीं देहैर्यशसापूरय़न्दिशः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
हतान्कृत्तानभिमुखान्वीरान्वीरैः सहस्रशः |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
हतान्गजान्समाश्लिष्य पर्वतानिव वाजिनः |
२० क