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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अधीय़न्तेऽव्रताः केचिद्वृथाव्रतमथापरे |
७१ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अधीय़ानं शंसितं सत्यसन्धं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११० ख
आदि पर्व
अध्याय ८५
यय़ातिरु उवाच
अधीय़ानः पण्डितं मन्यमानो; यो विद्यया हन्ति यशः परेषाम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
अग्निरु उवाच
अधीय़ानः पण्डितं मन्यमानो; यो विद्यया हन्ति यशः परेषाम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
अधीय़ानस्य राजर्षेर्दिव्यरूपा मनस्विनी |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
अधीय़ानाः परं व्रह्म व्राह्मणस्य निवेशने ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
अधीय़ानान्पुरा वालान्व्रतस्थान्मधुसूदन ||
७१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
अधीय़ीत व्राह्मणोऽथो यजेत; दद्यादिय़ात्तीर्थमुख्यानि चैव |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
अधीय़े वाय़सीं विद्यां शंसन्ति मम वाय़साः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ||
१०३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
अधृतात्मन्धृतौ तिष्ठ दुर्वुद्धे वुद्धिमान्भव |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
अधृष्यं वरुणस्येव निधिपूर्णमिवोदधिम् |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
अधृष्यः सर्वभूतानां विश्वास्यः सर्वजन्तुषु |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय २७
शौनक उवाच
अधृष्यः सर्वभूतानामवध्यश्चाभवत्कथम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
अधृष्यः सर्वभूतानामाय़ुष्मान्नीरुजः सुखी |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
अधृष्या यदिय़ं व्रूय़ात्तथा तन्नान्यथा भवेत् ||
८१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
अधो न क्षीय़ते जातु यस्मात्तस्मादधोक्षजः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
अधो नाभ्या न हन्तव्यमिति शास्त्रस्य निश्चय़ः |
६ क
स्त्री पर्व
अध्याय १३
गान्धार्यु उवाच
अधो नाभ्यां प्रहृतवांस्तन्मे कोपमवर्धय़त् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
अधो भूमेः सहस्रेषु तावत्स्वेव प्रतिष्ठितम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ३२
सूत उवाच
अधो भूमेर्वसत्येवं नागोऽनन्तः प्रतापवान् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ३२
व्रह्मो उवाच
अधो महीं गच्छ भुजङ्गमोत्तम; स्वय़ं तवैषा विवरं प्रदास्यति |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
अधो वै सम्वभूवाशु भूमेर्विवरगो नृपः |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
अधो हि वर्षमस्माकं मर्त्यास्तूर्ध्वप्रवर्षिणः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १३४
लोमश उवाच
अधोमुखं ध्यानपरं तदानी; मष्टावक्रं चाप्युदीर्यन्तमेव ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
अध्यक्रामदमेय़ात्मा द्वितीय़ इव वासवः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
अध्यक्षं सर्वभूतानां धातारमकरोत्प्रभुः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
अध्यगच्छत्कृशानश्वान्समर्थानध्वनि क्षमान् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
अध्यगा नैष्ठिकीं वुद्धिं कुतस्त्वामिदमागतम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
अध्यगीष्ट स वेदांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १५४
व्राह्मण उवाच
अध्यगीष्ट स वेदांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
अध्यतिष्ठत्पदा भूमौ सहाश्वं सहसारथिम् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
अध्यतिष्ठत्पुनः क्षत्रं सशैलवनकाननाम् ||
११ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अध्यतिष्ठत्स तेजस्वी रथं प्राप्य सुदर्शनम् ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
अध्यतिष्ठद्यथाम्भोदं विद्युत्वन्तं दिवाकरः ||
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
अध्यर्धगुणमाहुर्यं वले शौर्ये च माधव |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
अध्यर्धमात्रे धनुषां सहस्रे तनय़स्तव |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
भीम उवाच
अध्यर्धेन गुणेनेय़ं गदा गुरुतरी मम |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अध्यर्धेन सहस्रेण पुत्रो दुर्मर्षणस्तव |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
अध्यवस्यति कार्येषु चिरं यशसि तिष्ठति ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
अध्याक्रम्य पशूंश्चापि घ्नन्ति वै भक्षय़न्ति च |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
युधिष्ठिर उवाच
अध्यात्मं नाम यदिदं पुरुषस्येह चिन्त्यते |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
अध्यात्मं नैष्ठिकं सद्भिर्धर्मकामैर्निषेव्यते ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
अध्यात्मं मन इत्याहुः पञ्चभूतानुचारकम् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
अध्यात्मं यदिदं तात पुरुषस्येह विद्यते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
शुक उवाच
अध्यात्मं विस्तरेणेह पुनरेव वदस्व मे |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
अध्यात्मं वुद्धिरित्याहुः षडिन्द्रिय़विचारिणी |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अध्यात्मं श्रूय़ते यच्च पञ्चभूतगुणात्मकम् |
१९६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
अध्यात्मं सर्वभूतानामागमानां च यद्वसु ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४३
व्यास उवाच
अध्यात्मं सुकृतप्रज्ञः सुखमव्ययमश्नुते ||
१५ ख