भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
निर्जित्य मातुलं सङ्ख्ये माद्रीपुत्रौ महारथौ |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
धृतराष्ट्र उवाच
निर्जित्य समरे द्रोणं कृतिनं युद्धदुर्मदम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
सञ्जय़ उवाच
निर्जित्य हि रणे पार्थः सर्वान्मम महारथान् |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
निर्जित्याजौ महाराज वङ्गराजमुपाद्रवत् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
निर्जित्यैकरथेनैव यत्कन्यास्तरसा हृताः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
निर्जिह्वान्त्राः क्षितौ क्षीणा रुधिरार्द्राः सुदुर्दृशः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
निर्जिह्वैश्च श्वसद्भिश्च कूजद्भिश्च गतासुभिः |
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
निर्जीवो जीवनो मन्त्रः शुभाक्षो वहुकर्कशः |
१२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
निर्जय़ं तव विप्राग्र्य सात्वतेनार्जुनेन च ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
निर्जय़ेत्त्रिदशान्युद्धे किमु पार्थान्ससोमकान् ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
निर्णिक्ततमसः पूता व्युत्क्रान्तरजसोऽमलाः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
निर्णिक्तधर्मार्थकरो मनस्वी; वहुश्रुतो दृष्टिमाञ्शीलवांश्च ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
निर्णय़ं चापि छिद्रात्मा न तं वक्ष्यति तत्त्वतः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
निर्णय़े वा महावुद्धे सर्वधर्मभृतां वर |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
निर्दग्धं क्षत्रमसकृद्रथेन जय़ता महीम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
निर्दग्धं परदेहेन परदेहं चलाचलम् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
निर्दग्धं भीमसेनेन सैन्यं हतरथद्विपम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्दग्धपक्षः पतितो ह्यहमस्मिन्महागिरौ ||
४९ ग
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्दग्धाः शत्रवः सर्वे वसता भुवि सर्वशः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
निर्दग्धुं पृथिवीपाल स हि वर्षशतैरपि ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
निर्ददाह जगत्कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् |
१२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
निर्ददाह रणे शूरान्वनं वह्निरिव ज्वलन् ||
८८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
निर्दशंश्चाधरोष्ठं च क्रुद्धो दारुणभाषिता |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
निर्दश्य दशनैश्चापि क्रोधात्स्वदशनच्छदान् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्दहत्यशिवो वाय़ुः स च संवर्तकोऽनलः ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
निर्दहन्क्षत्रिय़व्रातान्द्रोणः पर्यचरद्रणे ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
निर्दहन्तं प्रजाः कालं कालः शमय़ते पुनः ||
१८८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्दहन्तं रणे योधान्दारय़न्तं च सर्वशः |
५८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
निर्दहन्तं समारोहन्दुर्धर्षं द्रोणमोजसा ||
९७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
निर्दहन्तमनीकानि तानि तानि पुनः पुनः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
निर्दहन्तमनीकानि साक्षादग्निमिवोत्थितम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
निर्दहन्तौ महाराज शरवृष्ट्या परस्परम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्दहन्नागलोकं च यच्च किञ्चित्क्षिताविह |
६२ क
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
निर्दहन्निव कोपेन सत्यवाक्संशितव्रतः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
निर्दहन्निव चक्षुर्भ्यां पार्षतं सोऽभ्यवैक्षत |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
अप्सरस ऊचुः
निर्दहन्निव चक्षुर्भ्यां योऽसावास्ते तपोनिधिः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
निर्दहन्पाण्डववनं चारु पर्यचरद्रणे ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
निर्दहेदनलोऽरण्यं यथा वाय़ुसमीरितः ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
निर्दहेदपि लोकांस्त्रीनिच्छन्नेष महाय़शाः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
भगवानु उवाच
निर्दहेय़ं कुरून्सर्वानिति मे धीय़ते मतिः ||
८७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
निर्दहेय़महं क्रोधात्तृणानीव हुताशनः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
धृतराष्ट्र उवाच
निर्दहेय़ुर्मम सुतान्किं पुनर्मन्युनेरिताः ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
निर्दहैषामनीकानि भीमेन शरतेजसा ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
निर्दह्यमानान्भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना ||
२० ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
निर्दिशन्निव सावज्ञं तदा सव्येन पाणिना ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
निर्दिशस्व यथातत्त्वं मय़ा पृष्टा वृहन्नडे |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
निर्दिश्यमानेषु तु सा वरेषु वरवर्णिनी |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
निर्दिष्टं यद्वृषाङ्केन पुण्यं सर्वार्थसाधकम् |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
महाभारत कथा
निर्दिष्टमासनं भेजे विनय়ाल्लोमहर्षणिः ||
५ ख