chevron_left  विचरन्नमितप्राणस्तिर्यगूर्ध्वमधस्तथाarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
विचरन्नमितप्राणस्तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
विचरन्विविधान्देशान्भ्रममाणस्तु तत्र वै ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
विचरन्विविधान्मार्गान्घातय़ामास पोथय़न् ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
विचरिष्यत्यभीः काले कालः क्रुद्धः प्रजास्विव ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
विचरिष्यन्ति सङ्ग्रामे निघ्नन्तः शात्रवांस्तव ||
२२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
विचरिष्यसि पापात्मन्सर्वव्याधिसमन्वितः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७
अगस्त्य उवाच
विचरिष्यसि पूर्णेषु पुनः स्वर्गमवाप्स्यसि ||
१५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
विचरिष्याम लोकेऽस्मिंस्त्वत्प्रसादपुरस्कृताः ||
१० ग
शल्य पर्व
अध्याय ६
शल्य उवाच
विचरिष्ये रणे युध्यन्प्रिय़ार्थं तव कौरव ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
विचरेदसमुन्नद्धः स सुखी स च पण्डितः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
विचरेद्यो यतिर्यत्तः स गच्छेत्पुरुषं प्रभुम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
विचलन्प्रथमोत्पाते हय़ानां भरतर्षभ ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय ९७
अगस्त्य उवाच
विचारणामपत्ये तु तव वक्ष्यामि तां शृणु ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
विचारश्च वितर्कश्च विवेकश्चोपजाय़ते |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११८
नारद उवाच
विचारश्च समुत्पन्नो निरीक्ष्य नहुषात्मजम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
विचार्य कुण्डधारस्तु मानुष्यं चलमध्रुवम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
विचार्य खलु पश्यामि तत्सुखं यत्र निर्वृतिः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
विचार्य मनसा पश्चादथ वुद्ध्या व्यवस्यति |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
विचार्य मुनिभिः सार्धं तत्कालसदृशं वचः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
विचार्यमत्र न हि ते सत्यमेतद्भविष्यति ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
विचार्यमाणो यः कामस्तव कृष्ण स नो गुरुः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
युधिष्ठिर उवाच
विचार्यैतद्द्वय़ं वुद्ध्या गमनं तत्र रोचय़े ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
विचारय़ति येनाय़ं निश्चय़े साध्वसाधुनी ||
१०२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
विचालय़न्ति दर्शनाद्घटस्व पुत्र यत्परम् ||
४४ ख
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
विचिक्षिपुर्यथा श्येना नभोगतमिवामिषम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
विचिक्षेप पृषत्कौघांस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
विचितां न तु वैदेह्या दर्शनं रावणस्य वा ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
विचित्य दक्षिणामाशां सपर्वतवनाकराम् |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
विचित्रं च शिरस्त्राणं जाम्वूनदपरिष्कृतम् ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय १०६
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रकवचं वीरं परमास्त्रविदं नृपम् |
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रकवचाः शूरा विचित्रध्वजकार्मुकाः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रकवचामुक्तैः सपताकैः स्वलङ्कृतैः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
विचित्रकवचे तस्मिन्हते मद्रनृपानुजे |
६५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रगतय़ः सर्वे या अवाप्यामरैः सह |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २१६
मार्कण्डेय़ उवाच
विचित्रध्वजसंनाहं नानावाहनकार्मुकम् |
४ ख
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
विचित्रध्वजसंनाहं विचित्ररथकार्मुकम् ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रपदसञ्चारा नानाश्रुतिभिरन्विताः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय २३
सूत उवाच
विचित्रफलपुष्पाभिर्वनराजिभिरावृतम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
विचित्रमणिमालाभिर्नादितं शङ्खपुष्करैः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
विचित्रमाल्यमुकुटो वसन्त इव मूर्तिमान् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
विचित्रमाल्याभरणैर्वलैर्दृश्यैः स्वलङ्कृतैः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
विचित्रमिदमाश्चर्यं न नो दृष्टं न च श्रुतम् ||
३७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
विचित्रमिदमाश्चर्यं मृगहन्प्रतिभाति मे |
११ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
विचित्रमुकुटापीडा विचित्रकवचध्वजाः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
विचित्रमृतुभिः षड्भिः कृत्वा संवत्सरं धनुः |
८३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
विचित्ररूपो विश्वात्मा एकाक्षर इति स्मृतः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यं कल्याणं पूजय़ामासतुस्तु ते ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यं च तदा वालमप्राप्तय़ौवनम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६९
भीष्म उवाच
विचित्रवीर्यं च शिशुं यौवराज्येऽभ्यषेचय़म् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
विचित्रवीर्यं राजानं जनय़ामास वीर्यवान् ||
३ ख