आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
वशे स्थास्यन्ति ते देवा यांस्त्वमावाहय़िष्यसि ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
वशे हि यस्येन्द्रिय़ाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||
६१ ख
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
वश्यतां च गतोऽसौ नः करिष्यति यथेप्षितम् ||
२५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
वश्या नेय़ा विनीताश्च न च सङ्घर्षशीलिनः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
वश्यां कुमारीं विहितां ये च तामुपभुञ्जते |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपाय़तः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
वश्यामात्यवलो राजा तत्पुरं स्वय़मावसेत् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
वश्येन्द्रिय़ं जितामात्यं धृतदण्डं विकारिषु |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
वश्येन्द्रिय़ं जितामात्यं धृतदण्डं विकारिषु |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
वश्येन्द्रिय़ो जितक्रोधो न हृष्यति न कुप्यति ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
वश्यो वलवतां धर्मः सुखं भोगवतामिव |
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
वषट्कारोऽभवज्ज्या तु धनुषस्तस्य भारत |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
वस तावन्महाप्राज्ञ कृतकृत्यो गमिष्यसि ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय
६४
ऋतुपर्ण उवाच
वस वाहुक भद्रं ते सर्वमेतत्करिष्यसि |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
वसतस्तस्य रामस्य ततः शूर्पणखाकृतम् |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
वसता राजशार्दूल राक्षसास्तत्र हिंसिताः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
जनमेजय़ उवाच
वसतां लोकवीराणामासंस्तद्व्रूहि सत्तम ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
वसति स्म महाप्राज्ञः पलितो नाम मूषकः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
वसति ह्यत्र पापात्मा हिडिम्वो नाम राक्षसः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४४
व्यास उवाच
वसतेह प्रतिच्छन्ना ममागमनकाङ्क्षिणः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
वसतोराश्रमे पुण्ये शंस नः सर्वमेव तत् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३४
युधिष्ठिर उवाच
वसतोऽत्र यथा चास्मान्न वुध्येत पुरोचनः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१५
वैशम्पाय़न उवाच
वसत्यत्र सखा तस्य तक्षकः पन्नगः सदा |
७ क
वन पर्व
अध्याय
६४
वृहदश्व उवाच
वसत्यनर्हस्तद्दुःखं भूय़ एवानुसंस्मरन् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
वसत्यरण्ये सह सोदरीय़ै; स्त्रैलोक्यनाथानधिगम्य नाथान् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
वसत्येको महानात्मा येन सर्वमिदं ततम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
वसत्सु तेषु प्रच्छन्नं पाण्डवेषु महात्मसु |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
जनमेजय़ उवाच
वसत्सु पाण्डुपुत्रेषु सर्वेष्वाश्रममण्डले ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
वसत्सु वृष्णिवीरेषु तत्राथ जनमेजय़ |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
वसत्स्वथ द्वैतवने पाण्डवेषु महात्मसु |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
६७
शकुनिरु उवाच
वसध्वं कृष्णय़ा सार्धमजिनैः प्रतिवासिताः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
वसध्वं पाण्डवश्रेष्ठा यावदर्जुनदर्शनम् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
वसनं शय़नं चैव निलय़ं चैव विद्धि मे ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
वसनस्येव छिद्राणि साधूनां विवृणोति यः |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
वसनात्सर्वभूतानां वसुत्वाद्देवय़ोनितः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
वसनान्यथ वर्माणि हन्यमानान्हतानपि |
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
वसनान्याददुः काश्चिद्दृष्ट्वा तं मुनिसत्तमम् ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
वसनो मधुवर्णश्च कलशोदर एव च |
६७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
वसन्गुरुकुले नित्यं नित्यमध्ययने रतः ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
वसन्तं तत्र नाज्ञासीद्विराटः पार्थमर्जुनम् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
वसन्तः पाण्डवाः सार्धं व्राह्मणैर्वनवासिभिः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
वसन्तकाले वलवान्विलं सर्पशिशुर्यथा ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
वसन्तमिन्द्रप्रासादे आकाशे स्फाटिके च तम् |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
वसन्तसमय़े राजन्पुष्पिताविव किंशुकौ ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
वसन्ति तव संहृष्टा मनोहरतरास्तथा ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
वसन्ति तेषु सत्त्वानि नानाजातीनि सर्वशः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
वसन्ति भूतानि च यत्र नित्यं; तस्माद्विद्वान्नावमन्येत देहम् ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
वसन्ति राक्षसा रौद्रास्तेभ्यो रक्षेत्सदा भवान् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
वसन्ति वासान्मार्गस्थाः सुरम्ये तरुसत्तमे ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
वसन्ति शाश्वतीर्वर्षा जना दुष्करकारिणः ||
२६ ख