द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
उन्मथ्य पुनराजह्रुः प्रेरिताः परमाङ्कुशैः ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
उन्ममाथ ध्वजं चास्य क्षुरप्रेण महारथः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
उन्ममाथ महाराज द्वितीय़ेनाच्छिनद्धनुः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
उन्ममाथ शिरः काय़ाद्द्रुमसेनस्य वीर्यवान् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
उन्मर्यादे प्रवृत्ते तु दस्युभिः सङ्करे कृते |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
उन्माथं च प्रमाथं च महावीर्यौ महाद्युती ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
उन्माथमप्यथादाय़ चण्डालो वीक्ष्य सर्वशः |
११७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
उन्मादं पुष्पदन्तं च शङ्कुकर्णं तथैव च |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
उन्मादमेके पुष्यन्ति यान्त्यन्ये द्विषतां वशम् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
उन्मादो मदनाकारो अर्थार्थकररोमशः |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहो गान्धर्व एव सः ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेय़ः सिद्धग्रहस्तु सः ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेय़ो यक्षग्रहस्तु सः ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं तं तु देवग्रहं विदुः ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं पैशाचं तं ग्रहं विदुः ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेय़स्तु पितृग्रहः ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेय़ो राक्षसो ग्रहः ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं सत्त्वं तस्य तु साधनम् ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं साधनं तस्य शास्त्रतः ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
उन्मुचो विमुचश्चैव स्वस्त्यात्रेय़श्च वीर्यवान् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
उन्मूलय़न्महावृक्षान्पोथय़ंश्चोरसा वली ||
३९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
उपकारमजानन्स कृतघ्न इति मे मतिः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
उपकाराय़ लोकस्य त्रिवर्गस्थापनाय़ च |
७६ क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
उपकारेण तत्तस्य क्षन्तव्यमपराधिनः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३५
वैशम्पाय़न उवाच
उपकारो महांस्तात कृतोऽय़ं मम खेचराः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
उपकारोऽस्य राजर्षेः कृतो नापकृतं मय़ा ||
२४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
उपकुर्याच्च शिष्याणामेतच्च हृदि वो भवेत् ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
उपक्रमानहं वेद पुनरेव फलोदय़ान् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
उपक्रान्ता निगृह्णीमो राक्षसैः सह वालिशान् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
उपक्रामति जन्तूंश्च उद्वेगजननः सदा |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
उपक्रीडन्ति तान्राजञ्शुभाश्चाप्सरसां गणाः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
उपक्रुष्टं जीवितं सन्त्यजेय़ु; स्ततः कुरूणां निय़तो वै भवः स्यात् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
उपक्रोशं चेह गतोऽसि राज; न्नोहेश्च पापं प्रसजेदमुत्र ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
प्रजा ऊचुः
उपक्षीणाः प्रजाः सर्वा राजा भव भवाय़ नः |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
उपकॢप्तान्यथाकालं विधिवद्भूरिवर्चसः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
उपगतफलभोगिनो निशाम्य; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
उपगम्य च राजानं युधिष्ठिरमुवाच ह ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
उपगम्य ततो भैमीं सुदेवो व्राह्मणोऽव्रवीत् ||
२६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
उपगम्य तदा धात्री देवानाह समागतान् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
उपगम्य तरुश्रेष्ठमशोकं पुष्पितं तदा |
९७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
उपगम्य महातेजा विनय़ेनाभ्यवादय़त् ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
उपगम्य महात्मानं शय़ानं शय़ने शुभे |
५८ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
उपगम्य महाप्राज्ञं शकुनिर्वाक्यमव्रवीत् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
उपगम्य यथान्याय़ं प्रश्नं पप्रच्छ सुव्रतः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
उपगम्य वनं पुण्यं तपस्तेपे यय़ातिजा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
भीष्म उवाच
उपगम्य वने पृथ्वीं सर्वभूतविहिंसय़ा |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
उपगम्य शनैः स्कन्दमाहाहं जननी तव ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
उपगम्यर्षय़ः पूर्वं जिज्ञासन्तः परस्परम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२३६
वैशम्पाय़न उवाच
उपगम्याव्रवीत्कर्णो दुर्योधनमिदं तदा ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय
२३७
दुर्योधन उवाच
उपगम्याव्रुवन्दीनाः पाण्डवाञ्शरणप्रदान् ||
५ ख