वन पर्व
अध्याय
१५९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वेषु वेश्मसु रम्येषु वसतामित्रतापनाः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वेष्वाश्रमेषूपविष्टाः स्नाय़न्तीश्च यथासुखम् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
स्वैः कर्मभिः सत्कृतानां घोरत्वं सम्प्रणश्यति ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
स्वैः प्राणैर्व्राह्मणप्राणान्परित्राय़ दिवं गतः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
स्वैः समेतः स मुदितः पाञ्चजन्यं व्यनादय़त् ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
स्वैः स्वैः सैन्यैः परिवृता मत्स्यराजानमन्वय़ुः ||
८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
स्वैः स्वैरनीकैः सहिताः परिवार्य महारथम् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वैः स्वैर्गुणैः सुसंय़ुक्तास्तस्मिन्वर्षे त्रय़ोदशे |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
स्वैरं रुदत विस्रव्धाः स्वैरं स्नेहेन पश्यत |
१०० क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
स्वैरंशैः सम्प्रसूय़ध्वं यथेष्टं मानुषेष्विति ||
४७ ग
वन पर्व
अध्याय
४६
धृतराष्ट्र उवाच
स्वैरमुक्ता अपि शराः पार्थेनामिततेजसा |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
स्वैरर्थैः परिसन्तुष्टास्ते नराः स्वर्गगामिनः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
स्वैरवृत्ता यथाकाममनुरूपमिवात्मनः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वैराहाराश्च पुरुषा योषितश्च विशां पते |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
स्वैरिणस्तापसा देवि सर्वे दारविहारिणः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
उमो उवाच
स्वैरिणो दारसंय़ुक्तास्तेषां धर्मः कथं स्मृतः ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
स्वैरिण्यस्तत्र नार्यो हि यथेष्टं प्रचरन्त्युत ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वैरेव यज्ञैस्तुष्टाः स्मो न्याय़ेनेच्छामहे वय़म् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
स्वैरेष्वपि न तेनाहं स्मरामि वितथं क्वचित् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वैर्धर्मै रेमिरे वर्णा दैवे कर्मणि निःस्पृहाः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं कापुरुषो मूढः परांश्च क्षेप्तुमिच्छसि ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
स्वय़ं किमर्थं तु भवाञ्श्रेय़ो न प्राह पाण्डवम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
स्वय़ं कृतानि कर्माणि जातो जन्तुः प्रपद्यते |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
स्वय़ं कृत्वा तु यः पापं शुभमेवानुतिष्ठति |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं कृत्वा पापमनार्यजुष्ट; मेभिर्युद्धे तर्तुमिच्छस्यरींस्तु ||
८५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
स्वय़ं कृत्वा विप्रलम्भं यथाव; न्मन्त्रैकाग्रो निश्चय़ं वै जगाम ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
स्वय़ं गच्छन्ति देवत्वं ततो देवानिय़ाद्भय़म् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ं च तुरगान्केचिन्निन्युर्हेमविभूषितान् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
स्वय़ं च वरदेनोक्ता व्रह्मणा सृजता प्रजाः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
स्वय़ं च शक्यं तद्द्रष्टुं सुसमाहितचेतसा ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वय़ं च स्नापय़ाम्येतौ तथा पादौ प्रधावय़े |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
स्वय़ं चापि मय़ा दृष्टश्चरता सागराम्वराम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ं चापि समर्थोऽसि त्रैलोक्योत्सादने अपि ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
स्वय़ं चैतान्समाश्वास्य रथोपस्थ उपाविशत् ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं चैवावरोह त्वमेतच्छ्रेय़स्तवानघ |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
स्वय़ं चैषामनडुहो युज्यन्ति च वहन्ति च |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
स्वय़ं चोपहृता भृत्या ये चाप्युपहृताः परैः ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
स्वय़ं तु कुर्वतस्तस्य जातु मानो भवेदिह ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं तु सर्वाणि वलानि राज; न्राजाभ्ययाद्गोपय़न्वै निशाय़ाम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
स्वय़ं त्वहं प्रार्थय़े तत्र गन्तुं; समाधातुं कार्यमेतद्विपन्नम् ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं दुर्योधनो युद्धे प्रतीपं मृत्युमाव्रजत् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं दुर्योधनो राजा पार्षतं समुपाद्रवत् ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं दुर्योधनो राजा प्रत्यगृह्णादभीतवत् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं दुर्योधनो राजा प्रत्यविध्यच्छितैः शरैः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
दुर्योधन उवाच
स्वय़ं दुर्वुद्धिना मोहाद्येन प्राप्तोऽस्मि संशय़म् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ं निवेश्याप्रतिमं महात्मा; पुरं महद्देवपुरप्रकाशम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ं निष्कलमालक्ष्य संविधत्स्व विशां पते |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं निय़च्छंस्तुरगानजिह्मगैः; शरैश्च भीमं पुनरभ्यवीवृषत् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४४
भीमसेन उवाच
स्वय़ं नेष्यामि राजेन्द्र मा विषादे मनः कृथाः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वय़ं परिचराम्येका स्नानाच्छादनभोजनैः ||
३८ ख