उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमन्यदा भीमसेन युद्धमेव प्रशंससि |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमपत्यं प्रति च मे प्रतिज्ञां वेत्थ वै पराम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
त्वमपि तथैव कुरुष्व यथा कृतमुपाध्याय़ेनेति ||
७३ घ
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
त्वमपीमां महावाहो चमूं द्रोणपुरस्कृताम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
५५
वृहदश्व उवाच
त्वमप्यक्षान्समाविश्य कर्तुं साहाय़्यमर्हसि ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमप्यगुणसंय़ोगात्प्राप्तं राज्यं न लव्धवान् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
अर्जुन उवाच
त्वमप्यत्र यथान्याय़ं कुरु कार्यमनन्तरम् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
त्वमप्यत्राभिसम्वुद्धः कथं वा मन्यते भवान् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
त्वमप्यन्तर्जलचरः कच्छपः सम्भविष्यसि ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमप्यमरसङ्काश वह कृष्णां घटोत्कच ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमप्यमितविक्रान्तः पाण्डवानां कुलोद्वहः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
त्वमप्यस्यामवस्थाय़ां प्रेतलोकं गमिष्यसि ||
२८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
त्वमप्याशंससे योद्धुं कुलजः क्षत्रिय़ो ह्यसि ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
त्वमप्युद्विजसे यस्य नोद्विजेय़महं कथम् ||
२८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
त्वमप्युपस्थिते वर्षे षट्त्रिंशे मधुसूदन |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
त्वमप्युपेक्षां कुरुषे तेषु नित्यं द्विजोत्तम ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
भीष्म उवाच
त्वमप्येतं विधिं त्यक्त्वा योगेन निय़तेन्द्रिय़ः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
त्वमप्येतद्विदित्वेह सर्वमाचर पुत्रक ||
६५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
गुरुरु उवाच
त्वमप्येतन्महाभाग यथोक्तं व्रह्मणो वचः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
त्वमप्येतेन कौन्तेय़ निवातकवचान्रणे |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२८६
सूर्य उवाच
त्वमप्येनमथो व्रूय़ा विजय़ार्थं महावल ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वमप्येभिर्महेष्वासैः सहाय़ैर्देवरूपिभिः |
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमप्येवं महावाहो मातरं पितरं कुलम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
त्वमप्येवमपेक्षस्व मात्मना विस्मय़ं गमः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
त्वमभ्रघनविक्षेप्ता त्वामेवाहुः पुनर्घनम् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
युधिष्ठिर उवाच
त्वमर्हो रक्षितुं ह्येनं नान्यः कश्चन मानवः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमवुद्ध्या नृपवर प्राणानुत्स्रष्टुमिच्छसि ||
२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता; सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
मन्दपाल उवाच
त्वमश्विनौ यमौ मित्रः सोमस्त्वमसि चानिलः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
त्वमस्माकं गतिर्नित्यं देवतानां च पाण्डवाः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
त्वमस्य जगतस्तात वेत्थ सर्वं गतागतम् |
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
त्वमस्य जगतो मूलं विनाशस्य न संशय़ः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
त्वमस्य मूलं वैरस्य तस्मादासादय़ार्जुनम् ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
जनक उवाच
त्वमस्य व्रह्मनाभस्य वुद्ध्यारस्यानिवर्तिनः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
त्वमस्य सक्थिनी भङ्क्त्वा प्रतिज्ञां पारय़िष्यसि ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
त्वमाजहर्थ देवानामेको वीर श्रिय़ं पराम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
३०
गरुड उवाच
त्वमादाय़ ततस्तूर्णं हरेथास्त्रिदशेश्वर ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
त्वमादिः सर्वभूतानां संहारश्च त्वमेव हि ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण; स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमाराधय़ितुं शक्तो नान्यः कश्चन विद्यते |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
त्वमाश्रितो नगस्याग्रं मूलं त्वहमुपाश्रितः |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
अर्जुन उवाच
त्वमितः पुण्डरीकाक्ष सुय़ोधनममर्षणम् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
त्वमित्यत्रभवन्तं त्वं व्रूहि पार्थ युधिष्ठिरम् |
६७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
त्वमित्युक्तो हि निहतो गुरुर्भवति भारत ||
६७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
त्वमित्युक्त्वैव राजानमेवं कश्मलमाविशः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमिमं पुण्डरीकाक्षमप्रधृष्यं दुरासदम् |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
त्वमिमं मे प्रपन्नाय़ संशय़ं व्रूहि पृच्छते |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमिमां पृथिवीं राजन्प्रशासिष्यसि पाण्डव |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमिवैषां सुभद्रा च प्रीत्या सर्वात्मना स्थिता |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
त्वमीश्वरस्वभावश्च स्वय़म्भूः पुरुषोत्तमः |
४१ क