वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
कस्य त्वेषानवद्याङ्गी यदि वापि न मानुषी ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
कस्य पाञ्चनखे कोशे साय़को हेमविग्रहः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
शौनक उवाच
कस्य पुत्रः स राजासीत्सर्पसत्रं य आहरत् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
युधिष्ठिर उवाच
कस्य पुत्रोऽथ नप्ता वा एतदिच्छामि वेदितुम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
युधिष्ठिर उवाच
कस्य मृत्युः कुतो मृत्युः केन मृत्युरिह प्रजाः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
युधिष्ठिर उवाच
कस्य लाभो विशिष्टोऽत्र तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
जनमेजय़ उवाच
कस्य वंशे समुत्पन्नः किं चाधीतं द्विजोत्तम |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
कस्य वः को मतः पक्षो व्रूत सत्यं समागताः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
कस्य वा को गुणो भूय़ानेतद्वद जनार्दन ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
कस्य वा त्वं कुतो वा त्वं किं वा तात चिकीर्षसि |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
कस्य वा संनिसर्गात्त्वं प्रविष्टा हृदय़ं मम ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
कस्य वाचा ह्यदैवं स्याद्यतो दैवं प्रवर्तते ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०१
जनमेजय़ उवाच
कस्य शापाच्च व्रह्मर्षे शूद्रय़ोनावजाय़त ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
कस्य सेनासमुदय़े गन्धमाल्यसमुद्भवः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
कस्य स्विद्धृदय़ं नास्ति किं स्विद्वेगेन वर्धते ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३३
राजो उवाच
कस्य स्विद्धृदय़ं नास्ति किं स्विद्वेगेन वर्धते ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
धृतराष्ट्र उवाच
कस्य स्विद्भ्रातृपुत्राणां चिन्तासु मुखमीक्षते ||
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
कस्य हेतोः परित्यज्य वनं गन्तुमभीप्ससि ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
ऐल उवाच
कस्य हेतोः सुकृतं नाम कुर्या; द्दुष्कृतं वा कस्य हेतोर्न कुर्यात् ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
कस्य हेमत्सरुर्दिव्यः खड्गः परमनिर्व्रणः ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
कस्य हेममय़े कोशे सुतप्ते पावकप्रभे |
३४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
कस्य ह्यकरुणस्यापि नेत्राभ्यामश्रु नाव्रजेत् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
कस्यचित्तस्कराः केचिज्जह्रुर्गा नृपसत्तम ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य ऋषय़ः सतपोधनाः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य कंसो निर्मथ्य वान्धवान् |
२९ क
मौसल पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य कुरुराजो युधिष्ठिरः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य कुवेरो नरवाहनः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
८०
नारद उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य जपन्नेव महातपाः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य दक्षो नाम प्रजापतिः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य दानवौ वीर्यवत्तरौ |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य धर्मराजो युधिष्ठिरः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य धौम्येन सह माधव |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
वैशम्पाय़न उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य नारदः परमेष्ठिजः |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य पुनरेव महातपाः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य भाग्यक्षय़ उपस्थिते |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य मृगय़ामटतो नृप |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य वृत्रहा कुरुनन्दन |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य व्यासः सत्यवतीसुतः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य सशिष्योऽङ्गिरसां वरः |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य सुराणामश्विनौ नृप |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
सत्यवानु उवाच
कस्यचिद्भूतभव्यस्य लाभेनान्तं तथा कुरु ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
कस्यचिन्नाभिजानामि प्रीतिं निष्कारणामिह ||
१४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
युधिष्ठिर उवाच
कस्यां चोत्पादय़ामास शुकं व्यासस्तपोधनः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
३४
देवा ऊचुः
कस्यां पुत्रं महात्मानं जनय़िष्यति वीर्यवान् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
कस्याद्य काय़ं प्रतिभिद्य घोरा; महीं प्रवेक्ष्यन्ति शिताः शराग्र्याः |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
सुदेष्णो उवाच
कस्याद्य न सुखं भद्रे केन ते विप्रिय़ं कृतम् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
कस्यान्यस्य सुरैः सर्वैर्लिङ्गं मुक्त्वा महेश्वरम् |
१०१ क
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
कस्यापध्यानजं चेदमागः पश्यामि वो धिय़ा ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
९
विराट उवाच
कस्यासि राज्ञो विषय़ादिहागतः; किं चापि शिल्पं तव विद्यते कृतम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
कस्यासि सुभगे त्वमिति ||
१२ क