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शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
आशीविषा इव क्रुद्धा भुजगा भुजगानिव ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
आशीविषा इव क्रुद्धा वीक्षां चक्रुः परस्परम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
आशीविषा इव क्रुद्धाः पर्वते गन्धमादने ||
३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
आशीविषा यथा नागा भित्त्वा गां सलिलं पपुः ||
५८ ख
सभा पर्व
अध्याय ५९
विदुर उवाच
आशीविषाः शिरसि ते पूर्णकोशा महाविषाः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
आशीविषानिव क्रुद्धांस्तानुपाचरत द्विजान् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
आशीविषानिव क्रुद्धान्द्विजानुपचरेत्सदा ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
आशीविषानिव क्रुद्धान्पतीन्परिचराम्यहम् ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
आशीविषान्घोरविषानिवाय़त; स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५७
विदुर उवाच
आशीविषान्नेत्रविषान्कोपय़ेन्न तु पण्डितः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
आशीविषाभान्खगमान्प्रमुञ्च; न्द्रौणिः पुरस्तात्सहसा व्यतिष्ठत् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
आशीविषाभैर्विंशद्भिः पञ्चभिश्चापि ताञ्शरैः |
५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
प्रह्राद उवाच
आशीविषाविव क्रुद्धावेकमार्गमिहागतौ ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
आशीविषाश्चीरधरा गोनासावरणास्तथा ||
८२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
आशीविषै रक्ष्यमाणं कुवेरदय़ितं भृशम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
आशीविषैः कृष्णसर्पैः सुप्तं चैनमदंशय़त् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
आशीविषैः कृष्णसर्पैः सुप्तं चैनमदंशय़त् |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
आशीविषैः परिवृतः कूपस्त्वमिव पार्थिव ||
४५ ग
शल्य पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
आशीविषैर्विषैश्चापि जले चापि प्रवेशनैः |
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
आशीविषैश्च तस्याहुः सङ्गतं यस्य राजभिः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
आशु ग्रन्थस्य वक्ता च स वै पण्डित उच्यते ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
आशु तच्छीलतामेति तदिदं त्वय़ि दृश्यते ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
आशुगा विमलास्तीक्ष्णाः सम्पेतुर्भुजगोपमाः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
आशुगा विमलास्तीक्ष्णाः सम्पेतुर्भुजगोपमाः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
आशौचो व्राह्मणो राजन्योऽश्नीय़ाद्व्राह्मणादिषु |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
आश्चर्यं चापि तद्राजन्सर्वसैन्यान्यपूजय़न् |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
आश्चर्यं तत्र राजेन्द्र सुमहद्दृष्टवानहम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५२
व्राह्मण उवाच
आश्चर्यं नात्र सन्देहः सुप्रीतोऽस्मि भुजङ्गम |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वासुदेव उवाच
आश्चर्यं परमं किञ्चित्तद्भवन्तो व्रुवन्तु मे ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २१
अष्टावक्र उवाच
आश्चर्यं परमं हीदं किं नु श्रेय़ो हि मे भवेत् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १८७
मार्कण्डेय़ उवाच
आश्चर्यं भरतश्रेष्ठ सर्वधर्मभृतां वर ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
आश्चर्यं सिन्धुराजस्य वधं जानन्ति पार्थिवाः |
४५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
आश्चर्यभूतं तपसः फलं सन्दर्शय़ामि वः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
वैशम्पाय़न उवाच
आश्चर्यभूतं भवतः श्रुतं नो वदतां वर |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
आश्चर्यभूतं मत्वा तद्राज्ञस्ते प्रत्यवेदय़न् |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५०
व्राह्मण उवाच
आश्चर्यभूतं यदि तत्र किं चि; द्दृष्टं त्वय़ा शंसितुमर्हसि त्वम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
युधिष्ठिर उवाच
आश्चर्यभूतं लोकस्य श्रोतुमिच्छाम्यरिन्दम ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच
आश्चर्यभूतं लोकेषु कथय़िष्यन्ति मानवाः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
आश्चर्यभूतं लोकेषु युद्धमेतन्महाद्भुतम् |
६४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
आश्चर्यभूतं लोकेऽस्मिन्समुद्रस्येव शोषणम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
आश्चर्यभूतं सुमहत्त्वदीय़ा; दृष्ट्वैव तद्भारत सम्प्रहृष्टाः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
आश्चर्यमगमंस्तत्र मुनय़ो दिवि विष्ठिताः ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
मरुत्त उवाच
आश्चर्यमद्य पश्यामि रूपिणं वह्निमागतम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
आश्चर्यमिति गोविन्दो व्रुवन्नश्वानचोदय़त् |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
आश्चर्यमित्यभाषन्त मुनय़श्चापि सङ्गताः ||
२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति; श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन; माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
आश्चर्यशो वर्षति तत्र देव; स्तत्राभीक्ष्णं दुःसहाश्चाविशन्ति ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५०
नाग उवाच
आश्चर्याणामिवाश्चर्यमिदमेकं तु मे शृणु |
८ क
वन पर्व
अध्याय २०६
व्याध उवाच
आश्रमं च मय़ा नीतो न च प्राणैर्व्ययुज्यत ||
७ ख