आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
अव्यक्तं प्रविशन्तीह महान्तं लोकमुत्तमम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
अव्यक्तं यदि वा व्यक्तं द्वय़ीमथ चतुष्टय़ीम् |
११४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
अव्यक्तं व्यक्तदेहेषु मर्त्येष्वमरमाश्रितम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
अव्यक्तं व्यक्तधर्माणं सगुणं निर्गुणं तथा |
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामवुद्धय़ः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
अव्यक्तः पावन विभो सहस्रांशो हिरण्मय़ः ||
३७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
अव्यक्तकर्मजा वुद्धिरहङ्कारं प्रसूय़ते |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
अव्यक्तकलवाक्यानि वदन्तं रेणुगुण्ठितम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
अव्यक्तजल्पी मध्वक्षो मध्यमः पाण्डवो वली ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०४
गुरुरु उवाच
अव्यक्तनाभं व्यक्तारं विकारपरिमण्डलम् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
अव्यक्तनामानि गुणांश्च तत्त्वतो; यो वेद सर्वाणि गतीश्च केवलाः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०४
गुरुरु उवाच
अव्यक्तनिधनं विद्यादव्यक्तात्मात्मकं मनः ||
१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
अव्यक्तपुरुषाभ्यां तु यत्स्यादन्यन्महत्तरम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
अव्यक्तप्रकृतिरय़ं कलाशरीरः; सूक्ष्मात्मा क्षणत्रुटिशो निमेषरोमा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
अव्यक्तप्रभवां शीघ्रां दुस्तरामकृतात्मभिः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०४
गुरुरु उवाच
अव्यक्तप्रभवान्याहुरव्यक्तनिधनानि च |
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अव्यक्तमक्षरं व्रह्म प्रधानं निर्गुणात्मकम् ||
८४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
अव्यक्तमव्रवीद्राजन्हतः कुञ्जर इत्युत ||
१०६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
अव्यक्तमाहुः प्रकृतिं परां प्रकृतिवादिनः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
अव्यक्तमिति विज्ञेय़ं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रिय़म् ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
अव्यक्तमिति विज्ञेय़ं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रिय़म् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
अव्यक्तमिति विज्ञेय़ं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रिय़म् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
अव्यक्तविद्यामभिधास्ये पुराणीं; वुद्ध्या च तेषां व्रह्मचर्येण सिद्धाम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
धृतराष्ट्र उवाच
अव्यक्तविद्यामिति यत्सनातनीं; व्रवीषि त्वं व्रह्मचर्येण सिद्धाम् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
अव्यक्तवीजप्रभवो वुद्धिस्कन्धमय़ो महान् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
अव्यक्तवोधनाच्चैव वुध्यमानं वदन्त्यपि ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
अव्यक्तवोधनाच्चैव वुध्यमानं वदन्त्युत ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तसत्त्वसंय़ुक्तो देवलोकमवाप्नुय़ात् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तस्तु न जानीते पुरुषो ज्ञः स्वभावतः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तस्थं परं यत्तत्पृष्टस्तेऽहं नराधिप |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तस्थं परं यत्तत्पृष्टस्तेऽहं नराधिप |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
अव्यक्तस्य तथैश्वर्यं क्रमशः प्रतिपद्यते |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तस्य नरश्रेष्ठ कालसङ्ख्यां निवोध मे |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
अव्यक्तस्य परं प्राहुर्विद्यां वै पञ्चविंशकम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
अव्यक्तस्येह विज्ञाने नास्ति तुल्यं निदर्शनम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
अव्यक्ता व्यक्तभावस्था या सा प्रकृतिरव्यया |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्ताच्च महानात्मा समुत्पद्यति पार्थिव |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४०
व्रह्मो उवाच
अव्यक्तात्पूर्वमुत्पन्नो महानात्मा महामतिः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
अव्यक्तात्प्रसृतं ज्ञानं ततो वुद्धिस्ततो मनः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
अव्यक्तात्मा पुरुषोऽव्यक्तकर्मा; सोऽव्यक्तत्वं गच्छति ह्यन्तकाले |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
व्रह्मो उवाच
अव्यक्तात्सत्त्वमुद्रिक्तममृतत्वाय़ कल्पते ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
अव्यक्तादि परं यच्च स एव परिगीय़ते ||
१९६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
अव्यक्तादि विशेषान्तं त्रसस्थावरसङ्कुलम् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
अव्यक्तादि विशेषान्तमविद्यालक्षणं स्मृतम् |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
अव्यक्तादेव सम्भूतः समय़ज्ञो गतः पुनः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
अव्यक्ताद्व्यक्तमुत्पन्नं लोकसृष्ट्यर्थमीश्वरात् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
अव्यक्ताद्व्यक्तमुत्पन्नं विद्यासर्गं वदन्ति तम् |
२१ क