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भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
विहाय़ वन्धूनथ सोदरांश्च; क्व यास्यसे नानुरूपं तवेदम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
विहाय़ वृत्तं पापिष्ठं धर्ममेवाभिसंश्रय़ेत् ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
विहाय़ शोकं दुर्धर्षं श्राद्धमस्य ह्यकल्पय़त् ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
विहाय़ शोकं धर्मात्मा ददौ श्राद्धमनुत्तमम् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
विहाय़ सङ्ग्रामशिरः प्रय़ातो; वैकर्तनः पाण्डववाणतप्तः ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
विहाय़ समरे भीमं दुद्रुवुर्वै दिशो दश ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
विहाय़ समरे राजन्सात्यकिं युद्धदुर्मदम् ||
१० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
विहाय़ सर्वसङ्कल्पान्वुद्ध्या शारीरमानसान् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
विहाय़ सर्वे तव पुत्रमुग्रं; पातं गदाय़ाः परिहर्तुकामाः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
विहाय़सं प्राक्रमद्वै कर्णस्य व्यथय़न्मनः ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
विहाय़सगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः |
१०७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
विहाय़सा च गमनं तथा सङ्कल्पितार्थता |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
विहाय़ैनं ततः पार्थस्त्रिगर्तान्प्रत्ययाद्वली |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
विहितं कामचाराणां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
विहितं कालनानात्वमनादिनिधनं तथा |
७१ क
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
विहितं चित्रपर्यन्तमातिष्ठत धनाधिपः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय २६०
व्रह्मो उवाच
विहितं तत्र यत्कार्यमभितस्तस्य निग्रहे ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
विहितं दृश्यते राजन्सागरान्ता च मेदिनी ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
विहितं पूर्वमेवात्र मय़ा वै व्येतु वो ज्वरः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १३१
श्येन उवाच
विहितं भक्षणं राजन्पीड्यमानस्य मे क्षुधा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
विहितं यतिभिर्वुद्धैः कपिलादिभिरीश्वरैः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
विहितः सर्वथैवासौ ममात्मा मुनिसत्तम ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
विहिता धर्मशास्त्रज्ञैर्गतिर्गतिमतां वर ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८१
भृगुरु उवाच
विहिता व्रह्मणा पूर्वं लोभात्त्वज्ञानतां गताः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
व्यास उवाच
विहितानीह कौन्तेय़ प्राय़श्चित्तानि कर्मिणाम् |
२३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
विहितान्नाः प्रजास्तास्तु जग्मुस्तुष्टा यथागतम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७५
समङ्ग उवाच
विहितेनैव जीवन्ति अरोगाङ्गा दिवौकसः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
विहितो ह्यस्य धात्रैव मृत्युः सात्यकिराहवे ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
विहीनः सर्वय़ोधैश्च पाण्डवान्वीक्ष्य संय़ुगे ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
विहीनकवचश्चाय़ं कृतः परपुरञ्जय़ः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
विहीनजमकर्माणं यः प्रगृह्णाति भूमिपः |
३० क
विराट पर्व
अध्याय १३
द्रौपद्यु उवाच
विहीनवर्णां सैरन्ध्रीं वीभत्सां केशकारिकाम् ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
धृतराष्ट्र उवाच
विहीनश्च स्वकैर्भृत्यैर्निर्जने चावृतो भृशम् ||
४ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
विहीनां पृथिवीं द्रष्टुं शक्तश्चिरमिह प्रभो ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३
युधिष्ठिर उवाच
विहीनानां स्वतनय़ैः पतिभिर्भ्रातृभिस्तथा ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
विहीनान्रथिनस्तत्र धावमानान्समन्ततः |
११२ क
सभा पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
विहीनान्सर्वकामेभ्यो दासभाववशं गतान् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
विहीनैः परिक्लिश्यन्तीं समुपेक्षन्त मां कथम् ||
१०५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
विहीनय़ोनिर्हि सुतोऽवसादय़े; त्तितीर्षमाणं सलिले यथोपलम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४४
भीष्म उवाच
विहृतास्मि त्वय़ा कान्त तन्मे नाद्यास्ति किञ्चन ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
विहृत्य च ततो राजन्सहिताः कुरुपाण्डवाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
विहृत्य देवलोकेषु पुनर्मानुष्यमेष्यथ ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
विहृत्य मासं सुखिनो वदर्यां; किरातराज्ञो विषय़ं सुवाहोः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
विह्वलं तत्समुद्भ्रान्तं सभय़ं भारतातुरम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
विह्वलं तमभिज्ञाय़ भर्तारं शरपीडितम् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
विह्वलः पतितो भूमौ नष्टचेता इव द्विपः ||
१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
विह्वलः प्रापतद्भूमौ हिरण्यकशिपोः सुतः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
विह्वलन्तो गता भूमिं शैला इव धरातले ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८५
भीष्म उवाच
विह्वलश्चाभवद्राजन्वेपथुश्चैनमाविशत् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
विह्वला चास्मि भगवंस्तेजो नष्टं च मेऽनघ ||
५८ ख