द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
विनिःश्वसन्तस्ते राजन्भग्नदंष्ट्रा इवोरगाः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
विनिःश्वसन्सर्प इवोग्रतेजा; ध्रुवं न शेते वसतीरमर्षात् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
विनिःश्वस्य ततः क्रुद्धः कृपः शारद्वतो नृप |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
विनिःश्वस्य यथा सर्पः प्रणिधाय़ रथे धनुः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
विनिःसृत्याय़यौ वह्निर्वाग्यतो विधिवत्प्रभुः |
४० ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
विनिकीर्णं प्रदृश्येत तथा सूता महीतले ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
विनिकीर्णं रथोपस्थे सौमदत्तेर्न पश्यसि ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
विनिकीर्णाः स्म दृश्यन्ते शतशोऽथ सहस्रशः |
१३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
विनिकीर्णानि योधानां वदनानि चकाशिरे ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
विनिकीर्णानि वीराणामनीकेषु समन्ततः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
उमो उवाच
विनिकीर्णामिषचय़े शिवानादविनादिते ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
विनिकृत्तभुजस्कन्धं कवन्धं भीमदर्शनम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
विनिकृत्तान्यदृश्यन्त शरीराणि शिरांसि च ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
विनिगृह्य हरीनश्वान्रथं च मम युध्यतः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
२
भीम उवाच
विनिग्राह्या यदि मय़ा निग्रहीष्यामि तानपि ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
विनिघ्नंस्तान्यनीकानि विधमंश्चैव तद्रजः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
विनिघ्नंस्तावकान्योधान्व्यादितास्य इवान्तकः ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
विनिघ्नन्केकय़ान्सर्वान्पाञ्चालानां च वाहिनीम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
विनिघ्नन्कौरवानीकं शूरसेनांश्च पाण्डवः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
विनिघ्नन्निशितैर्वाणै रथाद्भीष्ममपातय़त् ||
१५७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
विनिघ्नन्पृथिवीपालांश्चेदिपाञ्चालकेकय़ान् |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
विनिघ्नन्मत्स्यराजस्य प्रीतिमावहदुत्तमाम् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
विनिघ्नन्समरे सर्वान्युगान्ते कालवद्विभुः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
विनिघ्नन्साय़कैस्तीक्ष्णैर्नवभिर्नतपर्वभिः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
धृतराष्ट्र उवाच
विनिघ्नन्सोमकान्वीरांस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३०
दुर्योधन उवाच
विनिद्रकरणं घोरं हृदि शल्यमिवार्पितम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
विनिधाय़ ततो भारं संनिधाय़ फलानि च ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
विनिन्दतां तथात्मानं जीवितं च धनच्युता ||
२० ग
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
विनिन्दन्स द्विजोऽऽत्मानं कौशिको नरसत्तम ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
विनिन्दन्स द्विजोऽऽत्मानमागस्कृत इवावभौ ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
भीष्म उवाच
विनिपातमिमं चाद्य शोचस्याहो न शोचसि ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
विनिपातमिमं मन्ये युष्माकमविचिन्तितम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१०
सुरभिरु उवाच
विनिपातो न वः कश्चिद्दृश्यते त्रिदशाधिप |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
विनिर्जित्य रिपून्वीराः सेनय़ोरुभय़ोरपि |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
विनिर्जय़े पाण्डवानामभवद्भरतर्षभ ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
विनिर्भिद्य क्षितिं जग्मुर्वल्मीकमिव पन्नगाः ||
३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
विनिर्भिद्य च कौन्तेय़ं महीतलमथाविशत् ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
विनिर्भिद्याकरोच्चैव सिंहनादमरिन्दम ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
विनिर्भिन्नाः शरैः केचिदन्तपीडाविकर्षिणः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
विनिर्भिन्नाः शरैस्तीक्ष्णैर्निपेतुर्धरणीतले |
९३ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
विनिर्भिन्नाः शितैर्वाणैर्गदातोमरशक्तिभिः |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
विनिर्ययौ नागपुराद्गदाग्रजो; रथेन दिव्येन चतुर्युजा हरिः ||
५२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
विनिर्ययौ रथेनैव श्वेताश्वः कृष्णसारथिः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
विनिवर्त्य ततो रुक्मी सेनां सागरसंनिभाम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
विनिवर्त्य मनः कामाद्धर्मे वुद्धिं चकार ह ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
विनिवार्य स वीराणामस्त्रैरस्त्राणि सर्वशः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
उत्तङ्क उवाच
विनिवृत्तश्च मे कोप इति विद्धि परन्तप ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
जनमेजय़ उवाच
विनिवृत्ता सरिच्छ्रेष्ठा कथमेतद्द्विजोत्तम ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
विनिवृत्तान्कुरून्दृष्ट्वा पाण्डवापि स्वसैनिकान् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
विनिवृत्ताभिसन्धानाः सुखमेधन्ति सर्वशः ||
१६ ख