अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
सकृज्जातिगुणोपेतः सङ्गत्या गृहमागतः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
सकृत्कृतापराधस्य तत्रैव परिलम्वतः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
सकृत्पाशावकीर्णास्ते न भविष्यन्ति दुर्दमाः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
सकृत्प्रभिन्नाविव वाशितान्तरे; महागजौ मन्मथसक्तचेतसौ ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
ऋषय़ ऊचुः
सकृत्सतां सङ्गतं लिप्सितव्यं; ततः परं भविता भव्यमेव |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२७८
सावित्र्यु उवाच
सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीय़ते |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२७८
सावित्र्यु उवाच
सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सकृत्सकृत् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
शुनःसख उवाच
सकृदुक्तं मय़ा नाम न गृहीतं यदा त्वय़ा |
४७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
सकृदुत्सृज्य तं नादं त्रासय़ानो मृगद्विजान् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
भीम उवाच
सकृद्भिन्नं त्वय़ा व्यूहं तत्र तत्र पुनः पुनः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
सकृद्रथेन प्रतिय़ाद्रथौघा; न्पदातिसङ्घान्गदय़ाभिनिघ्नन् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७८
सावित्र्यु उवाच
सकृद्वृतो मय़ा भर्ता न द्वितीय़ं वृणोम्यहम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
सकृन्नन्दां समासाद्य कृतात्मा भवति द्विजः |
१३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
सकृन्मय़ा विशीर्येत गिरिः शतसहस्रधा ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
सकृष्णाः पाण्डवाः पञ्च देवैरपि दुरासदाः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
सकेय़ूराङ्गदान्वाहून्हृद्यगन्धानुलेपनान् |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
सकोशवलसंवृद्धः सम्यक्सिद्धिमवाप्स्यसि ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
सक्तं चैनं ज्ञात्वाप्सरस ऊचुर्गच्छामहे वय़ं यथागतमिति ||
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
सक्तचक्षुरभिप्राय़ं हृदय़ेनानुचिन्तय़न् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
सक्ततामात्मनश्चैव प्रीतोऽभूद्व्रीडितश्च ह ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
सक्तभावा विनश्यन्ति नरास्तत्र न संशय़ः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
सक्तमात्मानमीशे च देवे नाराय़णे तथा |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
सक्तवुद्धिरशान्तात्मा न स शक्यश्चिकित्सितुम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
सक्तस्य वुद्धिश्चलति मोहजालविवर्धिनी |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
कृशतनुरु उवाच
सक्ता या सर्वभूतेषु साशा कृशतरी मय़ा ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
सक्तुधानाकरम्भाश्च नोपभोज्याश्चिरस्थिताः ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
सक्तुप्रस्थचतुर्भागं गृहाणेमं प्रसीद मे ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
सक्तुप्रस्थलवैस्तैर्हि तदाहं काञ्चनीकृतः |
८९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
सक्तुप्रस्थेन यज्ञोऽय़ं संमितो नेति सर्वथा ||
८८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
सक्तुप्रस्थेन वो नाय़ं यज्ञस्तुल्यो नराधिपाः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
सक्तुप्रस्थेन वो नाय़ं यज्ञस्तुल्यो नराधिपाः |
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
सक्तुप्रस्थेन हि जितो व्रह्मलोकस्त्वय़ानघ |
७९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
सक्तुवाट्यावलिप्तेषु श्वादिलीढेषु निर्घृणाः ||
३८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पितो उवाच
सक्तूनादाय़ संहृष्टा गुरुं तं वाक्यमव्रवीत् ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पितो उवाच
सक्तूनिमानतिथय़े गृहीत्वा त्वं प्रय़च्छ मे ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पुत्र उवाच
सक्तूनिमान्प्रगृह्य त्वं देहि विप्राय़ सत्तम |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
सक्तो मानुषमांसेषु यथोक्तः शक्तिना पुरा |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
सक्रोध इति तं मत्वा राजा प्रत्युद्ययौ हरिः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
सक्रोधामर्षजिह्मभ्रूसकषाय़दृशस्तथा ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
सक्रोधो भय़मुत्सृज्य अभिदुद्राव पार्षतम् ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सक्षद्द्रुहः कुन्तलाश्च हूणाः पारतकैः सह ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
सखड्गं यज्ञशीलस्य पत्रिणा वाहुमच्छिनत् ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
सखड्गस्य महाराज चरतस्तस्य संय़ुगे |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सखड्गाः साङ्गुलित्राणाः सपट्टिशपरश्वधाः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सात्यकिरु उवाच
सखड्गोऽस्य हृतो वाहुरेतेनैवास्मि वञ्चितः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
सखड्गौ चित्रवर्माणौ सनिष्काङ्गदभूषणौ |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
सखा च ते भविष्यामि मत्समो नास्ति पन्नगः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
सखा ते दय़ितो नित्यं य एष रणकर्कशः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
सखा दशरथस्यासीज्जटाय़ुररुणात्मजः |
१ क