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वन पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य रात्रौ दिवा चाहं त्वत्कृते भरतर्षभ |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
अद्य रात्रौ विश्रमस्व विमुक्तकवचध्वजः ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
अद्य वः सरथान्साश्वानशस्त्रो विरथोऽपि सन् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
अद्य वर्षसहस्रं मे साग्रं जातस्य मानुषाः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
अद्य वाणमय़ं वर्षं सृजतो मम धन्विनः |
५७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अद्य वाष्पमुखीं कृष्णां सान्त्वय़िष्यसि माधव |
८३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
अर्जुन उवाच
अद्य व्रह्मोत्तरं लोकं करिष्ये क्षत्रिय़ोत्तरम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
अद्य शक्ता रणे जेतुं रथस्थं मां नरर्षभ ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
अद्य शोकं विजानामि मानुषाणां महीतले |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अद्य श्रुत्वा हतं पुत्रं धृतराष्ट्रो जनेश्वरः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य श्रुत्वा हतान्पुत्रान्भृशं मे दीर्यते मनः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
अद्य संय़मनीं याता मय़ा त्वं निहतो रणे |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अद्य सप्तदशाहानि वर्तमानस्य भारत |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
अद्य सप्तदशाहानि वर्तमानस्य भारत |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अद्य सप्तैव चाहानि हतः सङ्ख्येऽभिमन्युना ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
अद्य सर्वा दिशो राजन्धाराभिरिव सङ्कुलाः |
३९ क
शल्य पर्व
अध्याय ६
शल्य उवाच
अद्य सैन्यानि पाण्डूनां द्रावय़िष्ये समन्ततः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सात्यकिरु उवाच
अद्य स्नेहं च भक्तिं च पाण्डवेषु महात्मसु |
२९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
कृप उवाच
अद्य स्वप्स्यन्ति पाञ्चाला विमुक्तकवचा विभो |
११ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
अद्य स्वप्स्यन्ति पाञ्चाला विश्वस्ता जितकाशिनः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अद्य स्वशोणिते मग्नं शय़ानं पतितं भुवि |
८७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
अद्य हन्मि रणे सर्वान्पाञ्चालान्पाण्डुभिः सह |
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अद्य हाहाकृता दीना विषण्णास्त्वच्छरार्दिताः |
८६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
भृगुरु उवाच
अद्य हि त्वा सुदुर्वुद्धी रथे योक्ष्यति देवराट् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
अद्यकालिकय़ा वुद्ध्या दूरे श्व इति निर्भय़ाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५३
युधिष्ठिर उवाच
अद्यप्रभृति गाङ्गेय़ः परं गुह्यं प्रवक्ष्यति |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
सूर्य उवाच
अद्यप्रभृति चैवैतल्लोके सम्प्रचरिष्यति |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
अद्यप्रभृति नैवात्र भय़ं व्यालाद्भविष्यति |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अद्यप्रभृति पार्थांश्च प्रेष्यभूत उपाचरन् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
अद्यप्रभृति वै वासं स्वर्गे नावाप्स्यसीति ह ||
३६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
अद्यप्रभृत्येतदवस्थितमृषिवचनम् ||
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४६
भीष्म उवाच
अद्यमानो जन्तुगृध्रैः शितिकण्ठैरय़ोमुखैः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अद्यात्मानं च दुर्मेधा गर्हय़िष्यति पापकृत् |
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
अद्यानृण्यं गमिष्यामि क्षत्रिय़ाणां यशस्विनाम् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अद्यान्तमेषां दुःखानां गन्ता भरतसत्तम |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९
इन्द्र उवाच
अद्यापि चाहमुद्विग्नस्तक्षन्नस्माद्विभेमि वै |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
अद्यापि चैनं पश्यामि युवां पश्यन्सनातनौ ||
३६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
अद्यापि तत्तत्र तथैव वर्ततां; शान्तिं गमिष्यामि यथा त्वमात्थ |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
दुर्योधन उवाच
अद्यापि त्वहमाशंसे त्वां विजेतुं युधिष्ठिर |
४३ क
वन पर्व
अध्याय १०२
लोमश उवाच
अद्यापि दक्षिणाद्देशाद्वारुणिर्न निवर्तते ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १९
गान्धार्यु उवाच
अद्यापि न जहात्येनं लक्ष्मीर्भरतसत्तमम् ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अद्यापि न विहृष्यन्ति तानि तद्विद्धि भारत |
१६ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
अद्यापि मानुषो भावः स्पृशते त्वां नराधिप |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
अद्यापि मुद्रा दृश्यन्ते तदद्भुतमरिन्दम ||
८३ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
अद्यापि यत्र दृश्यन्ते मत्स्याः सौवर्णराजताः ||
१०३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
अद्याप्यनुविधीय़न्ते कामद्वेषविवर्जिताः |
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
अद्याप्युत्तङ्कमेघाश्च मरौ वर्षन्ति भारत ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अद्याभिमन्युजननीमनृणः सान्त्वय़िष्यसि |
८२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अद्यार्जुनधनुर्घोषं घोरं जानातु संय़ुगे ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अद्यासौ सौवलः कृष्ण ग्लहं जानातु वै शरान् |
१३ क