भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
कुरवः पाण्डवैः सार्धं यथाय़ुध्यन्त भारत |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
कुरवः संन्यवर्तन्त मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
कुरवः सन्त्रसिष्यन्ति वज्रपाणेरिवासुराः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
कुरवः सहपाञ्चालाः शाल्वा मत्स्याः सनैमिषाः |
६० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
धृतराष्ट्र उवाच
कुरवश्च कथं युद्धे पाण्डवान्प्रत्यवारय़न् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
कुरवश्च महावाहुं विदुरस्य गृहे स्थितम् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
कुरवस्तु ततः कर्णं परिवार्य समन्ततः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
कुरवो युद्धमेवात्र रौद्रं कर्म भविष्यति ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९६
द्रोण उवाच
कुरवो विनशिष्यन्ति नचिरेणेति मे मतिः ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
कुरवो हि महाराज निर्विषाः पन्नगा इव |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
कुरवोरश्छदं जग्मुर्मागधं क्षेत्रमच्युताः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
कुरवोऽथ कुरुक्षेत्रं त्रय़मेतदवर्धत ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
कुरवोऽऽत्महितं मन्त्रं मन्त्रय़ां चक्रिरे तदा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
कुराजभिश्च सततं करभारप्रपीडिताः ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
कुराजाधिष्ठिते राज्ये न विनश्येम सर्वशः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
कुराज्ये निर्वृतिर्नास्ति कुदेशे न प्रजीव्यते ||
९० ख
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वर्गो उवाच
कुरु कर्म शुभं वीर एताः सर्वा विमोक्षय़ ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
कुरु कार्यं यथोत्साहं मन्यसे यन्नराधिप ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
कुरु कार्याणि कौन्तेय़ हय़मेधार्थसिद्धय़े ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
कुरु कार्याणि धर्म्याणि नमस्ते भरतर्षभ ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
कुरु कृच्छ्रे सहाय़ार्थमर्जुनस्य नरर्षभ ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
कुरु क्षिप्रं वचोऽस्माकं ततः श्रेय़ोऽभिपत्स्यसे ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
कुरु त्वं सर्वकृत्यानि महत्ते भय़मागतम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
कुरु त्वमात्मनो गुप्तिं कस्ते गोप्ता गते मय़ि |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
विरूप उवाच
कुरु धर्ममधर्मं वा विनय़े नौ समाधय़ ||
९६ ख
वन पर्व
अध्याय
२०७
अङ्गिरा उवाच
कुरु पुण्यं प्रजास्वर्ग्यं भवाग्निस्तिमिरापहः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
कुरु प्रसादं देवेश दानवाञ्जहि शूलभृत् ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३५
सूत उवाच
कुरु प्रसादं देवेश शमय़ास्य मनोज्वरम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
कुरु प्रिय़ममित्रघ्न लोकस्य च हितं कुरु ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
स्त्र्यु उवाच
कुरु मा विमतिं विप्र श्रद्धां विजहि मा मम ||
२० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
कुरु मे वचनं तात येन पश्चान्न तप्यसे ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
कुरु मे वचनं राजन्मा मृत्युवशमन्वगाः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
कुरु यत्नं द्विजश्रेष्ठ जीवय़ैनं वनस्पतिम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
कुरु वाक्यं पितुर्मातुरस्माकं च हितैषिणाम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
कुरु व्राह्मणसात्सर्वामश्वमेधे महाक्रतौ ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
कुरु शल्य विनिश्चित्य मा भूदत्र विचारणा ||
१३० ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
कुरु शापान्तमित्युक्तो भगवान्मुनिसत्तमः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
कुरु सत्त्वं च मानं च विद्धि पौरुषमात्मनः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
कुरु सेतुं समुद्रे त्वं शक्तो ह्यसि मतो मम ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
कुरुः खलु दाशार्हीमुपय़ेमे शुभाङ्गीं नाम |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
कुरुकर्ता कालरूपी कुरुभूतो महेश्वरः ||
१०४ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् |
१७६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
कुरुक्षेत्रं ततो दृष्ट्वा दत्त्वा दाय़ांश्च सात्वतः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
भीष्म उवाच
कुरुक्षेत्रं महाराज कन्यया सह भारत ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
कुरुक्षेत्रं रणक्षेत्रमुपाय़ां भरतर्षभ ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
कुरुक्षेत्रं स तपसा पुण्यं चक्रे महातपाः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
कुरुक्षेत्रस्य तद्द्वारं विश्रुतं भरतर्षभ |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
कुरुक्षेत्रस्य पश्चार्धे व्यवतिष्ठन्त दंशिताः ||
११ ख