वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वतेजसा तस्य नगोत्तमस्य; महौषधीनां च तथा प्रभावात् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
स्वतेजसैव तं शापं कुरु सत्यमृषेर्विभो |
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
स्वतेजो व्यदधाच्छक्रे वलमस्य विवर्धय़न् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वतेजोभास्वरं चक्रमुत्ससर्ज जनार्दनः |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वदते वन्यमन्नं वा मुनिवासांसि वा विभो ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
स्वदर्शनानुमानतः प्रवर्णितं कुरुष्व तत् ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
स्वदारतुष्ट ऋतुकालगामी; निय़ोगसेवी नशठो नजिह्मः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
युधिष्ठिर उवाच
स्वदारतुष्टिश्चोक्ता ते फलं दानस्य चैव यत् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
स्वदारनिरता ये च ऋतुकालाभिगामिनः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
स्वदारनिरतो दान्तः शिष्टाचारो जितेन्द्रिय़ः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
स्वदारनिरतो दान्तो ह्यनसूय़ुर्जितेन्द्रिय़ः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८४
भृगुरु उवाच
स्वदारविहारसन्तोषः कामसुखावाप्तिरिति ||
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
स्वदारिणां धर्मधुरे महात्मनां; यथोचिते वर्त्मनि सुस्थितानाम् |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
स्वदारे भरतश्रेष्ठ शापदोषसमन्वितः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वदेशमगमन्हृष्टा राजानो भरतर्षभ ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स्वदेशवेषाभरणा वीराः शतसहस्रशः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
स्वदेशे परदेशे वा अतिथिं नोपवासय़ेत् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
स्वदेशे परदेशे वा न ते धर्मो विनश्यति ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
स्वदेशे परदेशे वाप्यतिथिं नोपवासय़ेत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
स्वदेहजानस्वसञ्ज्ञान्यद्वदङ्गात्कृमींस्त्यजेत् |
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
स्वदेहरूपाण्यादाय़ गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
स्वदेहादुत्थितान्गन्धांस्तथा विज्ञाय़ चाशुभान् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
स्वदेहे नाभिषङ्गो मे कुतः परपरिग्रहे |
१६२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
स्वदोषकोपनाद्रोगं लभते मरणान्तिकम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
स्वदोषादपरज्यन्ते तेनासि हरिणः कृशः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वदोषेणापदं प्राप्य कच्चिन्नाद्य विमुह्यसि ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वधर्म इति कृत्वा तु न त्यजामि द्विजोत्तम |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वधर्मं चर धर्मज्ञ यथाशास्त्रं यथाविधि |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
विश्वामित्र उवाच
स्वधर्मं न प्रहास्यामि नय़िष्ये ते वलेन गाम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
स्वधर्मं नानुतिष्ठन्ति ते द्विजा वैश्यतां गताः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
स्वधर्मं निन्दमानाश्च प्रणिपत्य महात्मने ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
स्वधर्मं नेच्छसे ज्ञातुं मिथ्या वचनमेव ते |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
स्वधर्मं पुरुषव्याघ्र राजपुत्री लभत्विय़म् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व विनीतो निय़तेन्द्रिय़ः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
स्वधर्मं विपुलं प्राप्य शक्रस्यैति सलोकताम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
स्वधर्मं वुध्यमानोऽपि हरिष्यामि श्वजाघनीम् ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
स्वधर्मः क्षत्रिय़स्यैष कार्पण्यं न प्रशस्यते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
स्वधर्मः परिपाल्यश्च राज्ञामेष विनिश्चय़ः |
१०८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८४
भृगुरु उवाच
स्वधर्मचरणे युक्ता ये भवन्ति मनीषिणः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
स्वधर्मजीविनो दान्ताः क्रिय़ावन्तस्तपस्विनः |
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
स्वधर्मनिरतो नित्यं सत्यवागनसूय़कः ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
स्वधर्मनिरतो विद्वान्सर्वेन्द्रिय़यतो मुनिः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
स्वधर्मनिष्ठां महतीमवाप्य; व्याप्तांश्च लोकान्यशसा समीय़ुः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
स्वधर्मपरितृप्ताय़ यो न वित्तपरो भवेत् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
स्वधर्ममनुतिष्ठत्सु धैर्यादचलितेषु च |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वधर्ममनुतिष्ठन्तो यदि माधव संय़ुगे |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
स्वधर्ममनुतिष्ठन्तो वय़ं चान्ये च घातिताः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वधर्ममनुतिष्ठामस्तस्मान्मृत्युभय़ं न नः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
स्वधर्ममनुपश्यन्तो न जहुः स्वामनीकिनीम् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |
३१ क