भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सर्वेष्वेव महाप्राज्ञ द्वीपेषु कुरुनन्दन |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
सर्वेष्वेवर्षिधर्मेषु जेय़ आत्मा जितेन्द्रिय़ः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेष्वेवाङ्गदेशेषु न ममार च शत्रुहा ||
७६ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेष्वेवाङ्गदेशेषु न ममार च शत्रुहा ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
सर्वेऽनुज्ञाताः प्रय़युः पार्थिवेन; यथाजोषं तर्पिताः प्रीतिमन्तः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
सर्वेऽन्तःस्था इमे लोका वाह्यमेषां न किञ्चन |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
सर्वेऽन्तरिक्षे ददृशुर्मनुष्याः; खस्थांश्च तान्विस्मय़नीय़रूपान् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
सर्वेऽभ्यधावन्क्रोशन्तस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेऽश्वमेधैरीजानास्तेऽभ्ययुर्दक्षिणाय़नम् ||
९६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सर्वैः कलिङ्गैरासन्नः संनिवृत्तेषु चेदिषु |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
सर्वैः क्रतुशतैरिष्टं न त्वमेकः शतक्रतुः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
सर्वैः पराक्रमैर्वीर वध्यः शत्रुरमित्रहन् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
सर्वैः पार्थिवशार्दूलैर्नानेनार्थोऽस्ति जीवता |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वैः पुत्रैः प्रिय़तमा द्रौपदी मे जनार्दन |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वैः समस्तैरृषिभिर्निरुक्तो; नाराय़णो विश्वमिदं पुराणम् ||
६८ ख
सभा पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वैः समेत्य संरव्धैर्दह्यतां वा कटाग्निना ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
सर्वैः सह मृतं श्रेय़ो न तु मे जीवितं क्षमम् ||
४० ग
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
सर्वैरङ्गैः समाश्लिष्य प्रसुप्त इव सोऽभवत् ||
५४ ग
सभा पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वैरपि गुणैर्युक्तो निर्वीर्यः किं करिष्यति ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
सर्वैरपि गुणैर्विद्वान्व्यतिषक्तो न लिप्यते |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वैरपि गुणैर्हीनो वीर्यवान्हि तरेद्रिपून् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
सर्वैरपि च जीवद्भिर्वीभत्सुरपराजितः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
४
युधिष्ठिर उवाच
सर्वैरपि च वक्तव्यं न प्रज्ञाय़न्त पाण्डवाः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
अर्जुन उवाच
सर्वैरपि समेतैर्वा न स्थातव्यं कथञ्चन ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सर्वैरवध्यो राधेय़ो देवैरपि सवासवैः |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
२८२
व्राह्मणा ऊचुः
सर्वैरस्माभिरुक्तं यत्तथा तन्नात्र संशय़ः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
सर्वैरिदानीं गन्तव्यं सहस्वर्गजितो वय़म् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
सर्वैरिहेन्द्रिय़ार्थैश्च व्यक्ताव्यक्तैर्हि संहितः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
सर्वैरिहेन्द्रिय़ार्थैस्तु व्यक्ताव्यक्तैः सुसंवृतः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वैरेतैः परित्यक्तः परिव्रजसि निष्क्रिय़ः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
सर्वैरेतैर्मदैर्मत्तावन्योन्यं भ्रुकुटीकृतौ |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
सर्वैरेव गुणैर्युक्तो द्रव्यवानपि यो भवेत् ||
२० ग
शल्य पर्व
अध्याय
५
द्रौणिरु उवाच
सर्वैर्गुणैः समुदितः शल्यो नोऽस्तु चमूपतिः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
धौम्य उवाच
सर्वैर्गुणैरुपेतस्ते यथा पुत्रो जनप्रिय़ः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
सर्वैर्गुणैरुपेताश्च पाण्डवा भरतर्षभ |
६७ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
सर्वैर्गुणैर्महाराज राजसूय़ं त्वमर्हसि |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
सर्वैर्ग्रहैर्गृहीतान्वै सर्वपापसमन्वितान् |
७१ क
वन पर्व
अध्याय
२६०
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वैर्देवगणैः सार्धं सम्भवध्वं महीतले ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
सर्वैर्देवैः परिवृतः शक्रो वृत्रनिषूदनः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
सर्वैर्देवैः स्तुतो देवः सैकधा वहुधा च सः |
६९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
सर्वैर्धर्मैः समुपेताः स्थ पार्थाः; प्रस्थानेन मार्दवेनार्जवेन |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वैर्भवद्भिर्द्रष्टव्यः समेषु विषमेषु च |
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वैर्भवद्भिर्यज्ञार्थे साहाय़्यं दीय़तामिति ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
सर्वैर्भवद्भिर्विदितं यथाय़ं; युधिष्ठिरः सौवलेनाक्षवत्याम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वैर्भवद्भिर्विदितो राजधर्मः सनातनः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वैर्योद्धव्यमस्माभिरिति नः समय़ः कृतः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सर्वैर्योधगुणैर्युक्तो मित्राणामभय़ङ्करः |
६१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वैर्विद्याधरैः पुण्यैर्योगसिद्धैस्तथा वृतः ||
८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
सर्वैरय़ं चेन्द्रिय़ैः सम्प्रय़ुक्तो; देहः प्राप्तः पञ्चभूताश्रय़ः स्यात् |
२९ क