शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
अपविध्यन्ति पापानि दानय़ज्ञतपोवलैः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
अपशास्त्रपरो राजा सञ्चय़ान्नाधिगच्छति |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
अपशुपतिवरप्रसादजा मे; त्रिभुवनराज्यविभूतिरप्यनिष्टा ||
९५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यं कृष्ण पृथिवीं धार्तराष्ट्रानुशासनात् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
अपश्यं तं द्विजश्रेष्ठं दृष्टवानस्मि यं पुरा ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यं तत्र च तदा समवेतान्दिवौकसः |
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
अपश्यं तत्र वेश्मानि तैजसानि कृतात्मनाम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
अपश्यं तमृषिं विद्धं शरेणानतपर्वणा |
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
अपश्यं ता महावाहो तिस्रः कन्याः स्वलङ्कृताः |
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
अपश्यं दानवांस्तत्र हताञ्शतसहस्रशः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
अपश्यं दानवाकीर्णं तद्दैत्यपुरमन्तिकात् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
अपश्यं देवसङ्घानां गतिमार्तिहरं हरम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
अपश्यं द्वारकां चाहं महाराज हतत्विषम् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
अपश्यं नलिनीं पूर्णामुदकस्येव भारत ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
अपश्यं निहतं वीरं सौभद्रमृषभेक्षणम् ||
६७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
गालव उवाच
अपश्यं पितरं तात इष्टिं कृत्वा विनिःसृतम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
अपश्यं विगतं धर्मं कामक्रोधवशात्मनाम् ||
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
अपश्यं सर्ववर्णानां युधिष्ठिरनिवेशने ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अपश्यं सहितानेकस्तं देशं समुपेय़ुषः ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
४०
सूत उवाच
अपश्यंश्चैव ते यान्तमाकाशे नागमद्भुतम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अपश्यंश्चैव सौभद्रमिदं वचनमव्रवीत् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
अपश्यंस्तेजसां राशिं सूर्यकोटिसमप्रभम् ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
अपश्यच्च महात्मानं कपिलं तुरगं च तम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
अपश्यच्छकुनान्कांश्चिद्धिरण्यसदृशच्छदान् ||
११ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
अपश्यच्छय़ने सुप्तमुत्तमौजसमन्तिके ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अपश्यञ्शत्रुदमनं नरव्याघ्रं धनञ्जय़म् ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अपश्यञ्शरतल्पस्थं भीष्मं कुरुपितामहम् ||
९२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
अपश्यत तदा पार्थो ज्वलन्तमिव पर्वतम् ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यत मरौ तस्मिञ्श्वय़ूथपरिवारितम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
अपश्यत महात्मानं व्यादिशन्तं युधिष्ठिर ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अपश्यत महाप्राज्ञं विदुरं साश्रुलोचनम् |
८३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
अपश्यत महावाहुर्न्यग्रोधं वाय़साय़ुतम् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अपश्यतस्तद्वदनं का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
अपश्यतां प्रिय़ान्पुत्रान्नैषां शोकोऽनुतिष्ठति |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५
सूत उवाच
अपश्यतां समाय़ान्तमुच्चैःश्रवसमन्तिकात् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अपश्यतो दीर्घवाहुं रक्ताक्षं यन्न दीर्यते ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
अपश्यतो विषक्तस्य यन्मे वाहुमचिच्छिदः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अपश्यतोऽद्य वीरस्य का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
अपश्यत्कपिसैन्यं तज्जितकाश्यग्रतः स्थितम् ||
१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
अपश्यत्कृतमाकाशमनाकाशं जनार्दनैः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
अपश्यत्तत्र गत्वा तं सूनामध्ये व्यवस्थितम् |
१० क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यत्तत्र तिष्ठन्ती सर्वं दिव्येन चक्षुषा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५२
भीम उवाच
अपश्यत्तत्र पञ्चाली सौगन्धिकमनुत्तमम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
अपश्यत्परिमार्गंश्च तां यां परगृहे द्विजः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
अपश्यत्पर्वतं श्वेतं शरस्तम्वैः सुसंवृतम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यत्प्रीतिजननं वालार्कसदृशद्युति ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
धृतराष्ट्र उवाच
अपश्यत्सञ्जय़ो नूनं कुन्तीपुत्रान्महारथान् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
अपश्यत्सर्वभूतानि कुशेषु शय़ितस्तदा ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
अपश्यत्सौम्यभावं च सूर्यस्य प्रतिदर्शनम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
अपश्यदग्निमाय़ान्तं पितरं वलिनां वली ||
१९ ख