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वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र व्रह्मणस्तीर्थमुत्तमम् |
८८ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र सङ्गमं लोकविश्रुतम् |
१३० क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र सरकं लोकविश्रुतम् |
६२ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र सुगन्धां लोकविश्रुताम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र स्थानं नाराय़णस्य तु |
१०६ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत व्रह्मर्षेर्गौतमस्य वनं नृप |
९३ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत्कुरुश्रेष्ठ शृङ्गवेरपुरं महत् |
६२ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत्सुवर्णाक्षं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेदनरकं तीर्थसेवी नराधिप |
१४६ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेन्नरव्याघ्र व्रह्मणः स्थानमुत्तमम् |
९५ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेन्नरश्रेष्ठ तीर्थं देव्या यथाक्रमम् |
१३१ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेन्नरश्रेष्ठ सोमतीर्थमनुत्तमम् |
९६ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिताः |
६५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
ततो गजगतो राजा भगदत्तः प्रतापवान् |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
ततो गजशिशुप्रख्यैरुपलैः शैलवासिनः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
ततो गजसहस्रेण रथानामय़ुतेन च |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
ततो गजा रथाश्चाश्वाः पत्तय़श्च महाहवे |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
ततो गजाः सप्तशताश्चापपाणिभिरास्थिताः |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गजे राजनि चैव भिन्ने; भग्ने विकर्णे च सपादरक्षे |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
ततो गतज्वरो राजा नलोऽभूत्पृथिवीपते |
३९ क
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
ततो गतज्वरो राजा नैषधः परवीरहा |
३५ क
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गते दारुके केशवोऽथ; दृष्ट्वान्तिके वभ्रुमुवाच वाक्यम् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गते भगवति कृष्णे देवकिनन्दने |
५६ क
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गते भ्रातरि वासुदेवो; जानन्सर्वा गतय़ो दिव्यदृष्टिः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४४
भीष्म उवाच
ततो गते शाकुनिके कपोती प्राह दुःखिता |
१ क
वन पर्व
अध्याय ५५
वृहदश्व उवाच
ततो गतेषु देवेषु कलिर्द्वापरमव्रवीत् |
१२ क
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गत्वा केशवस्तं ददर्श; रामं वने स्थितमेकं विविक्ते ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
ततो गत्वा धृतराष्ट्रो नरेन्द्रं; प्रोवाचेदं वचनं वासवस्य |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
मतङ्ग उवाच
ततो गत्वा महारण्यमतप्यत महत्तपः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो गत्वा समासाद्य लङ्कोद्यानान्यनेकशः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
ततो गत्वा सरस्वत्याः सागरस्य च सङ्गमे |
७९ क
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गत्वाथ तद्वेश्म कीचकं विनिपातितम् |
६६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
ततो गदां नृनागाश्वेष्वाशु भीमो व्यवासृजत् |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
ततो गदां वीरहणीमय़स्मय़ीं; प्रगृह्य वज्राशनितुल्यनिस्वनाम् |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
ततो गदाग्राभिहतौ क्षणेन रुधिरोक्षितौ |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ९
सूत उवाच
ततो गन्धर्वराजश्च देवदूतश्च सत्तमौ |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
ततो गर्भं समासाद्य तत्रैव म्रिय़ते शिशुः ||
८३ ग
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गर्भः समभवत्पृथाय़ाः पृथिवीपते |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
ततो गर्भः सम्भवति स्त्रीपुंसोः पार्थ सङ्गमे |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
ततो गर्भशतैर्जन्तुर्वहुभिः सम्प्रजाय़ते |
८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
ततो गव्यूतिमात्रेण मृगय़ूथपय़ूथपः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
ततो गाण्डीवधन्वानमभ्यभाषत केशवः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
ततो गाण्डीवधन्वानमव्रवीन्मधुसूदनः |
४८ क
सभा पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
ततो गाण्डीवनिर्घोषं श्रुत्वा पार्थस्य धीमतः |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
ततो गाण्डीवनिर्घोषः प्रादुरासीद्विशां पते |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
ततो गाण्डीवनिर्घोषो महानासीद्विशां पते |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गाण्डीवनिर्मुक्ता निरमित्रं चिकीर्षवः |
३१ क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गाण्डीवनिर्मुक्तैः शरैः पार्थो धनञ्जय़ः |
५८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गाण्डीवनिर्मुक्तैरिषुभिर्मोहितो नृपः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गाण्डीवभृच्छूरो गाण्डीवप्रेषितैः शरैः |
११ क