उद्योग पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
सेनां निर्यापय़ामास धृष्टद्युम्नपुरोगमाम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
सेनां निवेश्य काकुत्स्थो विधिवत्पर्यरक्षत ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
सेनां निसूदय़न्त्येष पश्य पाण्डव दुर्मतिम् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
सेनां प्रहर्षय़न्सर्वामिदं वचनमव्रवीत् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
सेनां वर्षन्तौ शरवर्षैरजस्रं; महारथौ समरे दुष्प्रकम्प्यौ ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
सेनां विभीषय़न्नाय़ाद्द्रोणप्रेप्सुर्घटोत्कचः ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
सेनाकक्षं दहति मे वह्निः कक्षमिवोत्थितः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६
द्रुपद उवाच
सेनाकर्म करिष्यन्ति द्रव्याणां चैव सञ्चय़म् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
सेनाकर्मण्यभिज्ञोऽस्मि व्यूहेषु विविधेषु च |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सेनाकल्पो महाकल्पो युगाय़ुगकरो हरिः |
१२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
सेनागोप्तॄनथादिश्य पुनर्व्यूहमकल्पय़त् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
सेनाग्रं धार्तराष्ट्रस्य प्राप्तं द्वैतवनं सरः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
सेनाग्रं वापि विद्राव्य हत्वा वा पुरुषं वरम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
सेनाग्रादभिनिष्पत्य प्राय़ुध्यंस्तत्र मानवाः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
सेनाग्रे विप्रकाशेते रुचिरे रथभूषिते ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
सेनाग्र्येण तृतीय़ेन व्यवहार्येण तिष्ठति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
सेनाजीवाश्च ये राज्ञां विषय़े सन्ति मानवाः |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
सेनाजीवी चोद्धृतभक्त एव; व्यवहारे वै वर्जनीय़ाः स्युरेते ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
सेनाजीवी श्रुतिविक्राय़कश्च; भृशं प्रिय़ोऽप्यतिथिर्नोदकार्हः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
सेनाजीवैश्च कौरव्य तथा विषय़वासिभिः |
३९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सेनाध्यक्षान्समानाय़्य सर्वानिदमथाव्रवीत् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
सेनानिवेशं सम्प्राप्य कैतव्यः पाण्डवस्य ह |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
सेनानिवेशमभितो नातिदूरमवस्थिताः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
सेनानिवेशमाजग्मुर्हतशेषास्त्रय़ो रथाः ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
सेनानिवेशास्ते राजन्नाविशञ्शतसङ्घशः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
सेनानिवेशे यद्वृत्तं कुरुपाण्डवसेनय़ोः ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
सेनानीः पुरुषव्याघ्र स्यालः परमदुर्मतिः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
सेनापतिं गुणो गन्ता न तु योधान्कथञ्चन ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
सेनापतिं प्रकुर्वन्ति ते जय़न्ति रणे रिपून् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
सेनापतिं प्रणेतारं किमकुर्वत मामकाः ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सेनापतिं महात्मानमसुराणां भय़ावहम् ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
सेनापतिः पाण्डवसृञ्जय़ानां; पाञ्चालपुत्रो न ममर्ष रोषात् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
सेनापतिः सुशर्माणं शीघ्रं मर्मस्वताडय़त् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
१०८
वैशम्पाय़न उवाच
सेनापतिः सुषेणश्च कुण्डोदरमहोदरौ |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
सेनापतिः सुषेणश्च जलसन्धः सुलोचनः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
कर्ण उवाच
सेनापतिः स्यादन्योऽस्माच्छुक्राङ्गिरसदर्शनात् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
सेनापतित्वं सम्प्राप्य भारद्वाजो महारथः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५
कर्ण उवाच
सेनापतित्वमर्हन्ति नात्र कार्या विचारणा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
सेनापतिपतिं चक्रे गुडाकेशं धनञ्जय़म् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
सेनापतिममित्रघ्नं धृष्टकेतुमथादिशत् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
सेनापतिरमेय़ात्मा धृष्टद्युम्नो महावलः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
सेनापतिर्भवानस्तु ताभ्यां द्रविणवत्तरः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
कर्ण उवाच
सेनापतिर्भविष्यामि तवाहं नात्र संशय़ः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
सेनापतिर्महाराज सत्यवांस्ते महारथः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
सेनापतिर्महेष्वासः सर्वसैन्येषु पूजितः ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
सेनापतिर्विराटस्य ददर्श जलजाननाम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
सेनापतिवचः श्रुत्वा पाण्डवानां वरूथिनी |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सेनापतिवचः श्रुत्वा शिखण्डिप्रमुखा गणाः |
८३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
सेनापतिवचः श्रुत्वा सोमकाः सह सृञ्जय़ैः |
१७ क