chevron_left  ऋत्विजस्तवarrow_drop_down
सभा पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
ऋत्विजस्तव तन्वन्तु सप्ततन्तुं महाध्वरम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १२७
लोमश उवाच
ऋत्विजैः सहितो राजन्सहामात्य उपाविशत् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
ऋद्धं गेहं सर्वकामैर्यच्च मे वसु किञ्चन |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ||
४३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
ऋद्धाभिजनवृद्धानां वेदवेदाङ्गवेदिनाम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
युधिष्ठिर उवाच
ऋद्धिं च स कथं प्राप्तः सर्वमेतद्व्रवीहि मे ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
ऋद्धिं दृष्ट्वा सुदेवस्य विस्मितः प्राह वासवम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
ऋद्धिं पाञ्चालराजस्य पश्यन्तस्तामनुत्तमाम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
ऋद्धिमन्तं ततस्तस्य स्पृहय़ामास रेणुका ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
ऋद्धिमन्तं महानागं सुपर्णः सहसाहरत् ||
१४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
ऋद्धिमन्तो महात्मानः शस्त्रपूता दिवं गताः |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
ऋद्धिमस्मासु तां दृष्ट्वा विवर्णो हरिणः कृशः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३१
भीष्म उवाच
ऋद्धिमस्यानुवर्तन्ते पुरा विप्रकृता जनाः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
युधिष्ठिर उवाच
ऋद्धिमाप्नोति किं कृत्वा मनुष्य इह पार्थिव ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
ऋद्धिर्वाप्यथ वा नर्द्धिः पर्याय़कृतमेव तत् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय १११
ऋश्यशृङ्ग उवाच
ऋद्धो भवाञ्ज्योतिरिव प्रकाशते; मन्ये चाहं त्वामभिवादनीय़म् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ४१
पितर ऊचुः
ऋद्धो भवान्महाभागो यो नः शोच्यान्सुदुःखितान् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ४१
पितर ऊचुः
ऋद्धो भवान्व्रह्मचारी यो नस्त्रातुमिहेच्छति |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
ऋद्ध्या च वरुणं देवं स्पर्धमानो युधिष्ठिरः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
ऋद्ध्या परमय़ा युक्तमिष्टं द्विजगणाय़ुतम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
ऋद्ध्या परमय़ा युक्तो महेन्द्र इव वज्रभृत् ||
१३ ग
सभा पर्व
अध्याय १४
कृष्ण उवाच
ऋद्ध्या मरुत्तस्तान्पञ्च सम्राज इति शुश्रुमः ||
११ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
ऋद्ध्या वैश्रवणं चाति नय़ेन च वृहस्पतिम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
ऋद्ध्या शक्रं योऽजय़न्मानुषः सं; स्तस्माद्यज्ञे सर्वमेवोपय़ोज्यम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
ऋभवो नाम तत्रान्ये देवानामपि देवताः |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
ऋभवो नाम वरदा देवानामपि देवताः |
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
ऋभवो मरुतश्चैव देवानां चोदिता गणाः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
ऋभुर्विभुः सर्वसूक्ष्मस्त्वं सावित्रं च पठ्यसे ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
ऋश्यप्रख्या भीमसेनस्य वाहा; रणे वाय़ोस्तुल्यवेगा वभूवुः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
ऋश्यमूकस्य शैलस्य संनिकर्षे तटाकिनी ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
ऋश्यमूके मय़ा सार्धं सुग्रीवो न्यवसच्चिरम् ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
ऋश्यवर्णाञ्जघानाश्वान्भोजो भीमस्य संय़ुगे |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
ऋश्यवर्णान्हय़ान्कर्कैर्मिश्रान्मारुतरंहसः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
ऋश्यवर्णैर्हय़ैर्दृष्ट्वा व्याय़च्छन्तं वृकोदरम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
ऋश्यशृङ्गं मुनिसुतमानय़स्व च पार्थिव |
२५ क
वन पर्व
अध्याय ११०
युधिष्ठिर उवाच
ऋश्यशृङ्गः कथं मृग्यामुत्पन्नः काश्यपात्मजः |
६ क
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
ऋश्यशृङ्गः सुतो यस्य तपस्वी संय़तेन्द्रिय़ः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
ऋश्यशृङ्गमृषेः पुत्रमानय़ध्वमुपाय़तः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
ऋश्यशृङ्गस्तपोनित्यो वन एव व्यवर्धत ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
ऋश्यशृङ्गस्य चरितं कौमारव्रह्मचारिणः |
११६ क
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
ऋश्यशृङ्गागमे यत्नमकरोन्मन्त्रनिश्चय़े ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
ऋश्यशृङ्गाय़ विपुलैः सर्वकामैरय़ुज्यत ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय २५१
द्रौपद्यु उवाच
ऋश्यान्रुरूञ्शम्वरांश्च गवय़ांश्च मृगान्वहून् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
ऋषभं तीर्थमासाद्य कोशलाय़ां नराधिप |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
ऋषभं दुन्दुभिग्रीवं तीक्ष्णशृङ्गं प्रहारिणम् |
४२ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
ऋषभं पर्वतं गत्वा पाण्ड्येषु सुरपूजितम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषभं पृष्ठ आलभ्य व्राह्मणानभिवाद्य च |
१० क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ऋषभद्वीपमासाद्य सेव्यं क्रौञ्चनिषूदनम् |
१३९ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषभप्रतिरूपाक्षाः शेरते हरितस्रजः ||
३६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
ऋषभप्रतिरूपाक्षौ शय़ानौ विमलस्रजौ ||
२७ ख