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उद्योग पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
गान्धार्या धृतराष्ट्रेण न च मन्दोऽन्ववुध्यत ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
गान्धार्या धृतराष्ट्रेण समक्षं मम भारत |
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्या सह नार्यस्तु सहिताः समुपाविशन् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
गान्धार्या सह रोदन्त्यः श्वगृध्रकुरराकुले |
५१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्या सहितं तन्मां समनुज्ञातुमर्हथ ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्या सहितो धीमान्कुन्त्या च प्रत्यनन्दत ||
१९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
गान्धार्या सहितो धीमान्वध्वा कुन्त्या समन्वितः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्या हि महावाहो क्रोधं वुध्यस्व माधव |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्यां क्लिश्यमानाय़ामुदरेण विवर्धता |
३५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याः कथय़ामास सहदेवमुपस्थितम् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याः क्रोधदीप्ताय़ाः पूर्वं प्रशमनं भवेत् ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याः क्रोधदीप्ताय़ाः प्रशमार्थमरिन्दम ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
जनमेजय़ उवाच
गान्धार्याः प्रेषय़ामास वासुदेवं परन्तपम् ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याः संनिकर्षे तु निषसाद कुशेष्वथ |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याश्च पृथाय़ाश्च धर्मराज्ञस्तथैव च |
२९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याश्च पृथाय़ाश्च विधिवन्नामगोत्रतः |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याश्च महाराज प्रददावौर्ध्वदेहिकम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १९५
भीष्म उवाच
गान्धार्याश्च यथा पुत्रास्तथा कुन्तीसुता मताः |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याश्चैव तेजस्वी पृथाय़ाश्च पृथक्पृथक् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याश्चैव नृपते जातं पुत्रशतं तथा |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याश्चैव यद्दुःखं हृदि तिष्ठति पार्थिव |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
गान्धार्याश्चैव राजेन्द्र तदनुज्ञातुमर्हसि ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्यास्तव चैवाद्य पाण्डवेषु प्रतिष्ठितम् ||
४९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
गान्धार्यास्तु पृथा राजंश्चक्षुरासीदनिन्दिता ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
गामप्येकां कपिलां सम्प्रदाय़; न्याय़ोपेतां कल्मषाद्विप्रमुच्येत् |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
गामश्वं वित्तमन्नं वा तद्विधे प्रतिपादय़ेत् |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गामानय़त्तामभिगम्य शश्व; न्पुमान्भय़ं नेह नामुत्र विद्यात् ||
९५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
गामाविश्य च भूतानि धारय़ाम्यहमोजसा |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
गाम्भीर्याद्धि समुद्रस्य न विशेषः कुलाधम |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
गारुडं च महाव्यूहं चक्रे शान्तनवस्तदा |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
गार्ध्रपत्राः पतन्त्युग्रास्तावच्छाम्यतु वैशसम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
गार्ध्रपत्राञ्शिलाधौतान्कार्तस्वरविभूषितान् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
गार्हपत्यं समाविश्य तस्मात्पश्याम्यभीक्ष्णशः ||
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
गार्हस्थ्यं तु द्वितीय़ं स्याद्वानप्रस्थमतः परम् |
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
युधिष्ठिर उवाच
गार्हस्थ्यं धर्ममखिलं प्रव्रूहि भरतर्षभ |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
वासुदेव उवाच
गार्हस्थ्यं धर्ममाश्रित्य मय़ा वा मद्विधेन वा |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
गार्हस्थ्यं धर्ममास्थाय़ असितो देवलः पुरा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
गार्हस्थ्यमस्य धर्मस्य मूलं यत्किञ्चिदेजते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
युधिष्ठिर उवाच
गार्हस्थ्यस्य च धर्मस्य त्यागधर्मस्य चोभय़ोः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
गार्हस्थ्ये यदि ते मोक्षे कृता वुद्धिरविक्लवा ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
गार्हस्थ्ये वर्तमानस्य धर्म एष सनातनः ||
२७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
उमो उवाच
गार्हस्थ्यो मोक्षधर्मश्च सज्जनाचरितस्त्वय़ा |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
गालवं वैनतेय़ोऽथ प्रहसन्निदमव्रवीत् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११५
नारद उवाच
गालवः प्रसवस्यार्थे तं नृपं प्रत्यचोदय़त् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
गालवस्तं तथा दृष्ट्वा विषण्णः पर्यपृच्छत ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
गालवस्तं तथेत्युक्त्वा सुपर्णसहितस्ततः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
गालवस्तु वचः श्रुत्वा वैनतेय़ेन भाषितम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
गालवस्त्वभ्यनुज्ञाय़ सुपर्णं पन्नगाशनम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
भीष्म उवाच
गालवस्य च संवादं देवर्षेर्नारदस्य च ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११६
नारद उवाच
गालवो विमृशन्नेव स्वकार्यगतमानसः |
२ क