भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
वनाय़वो दशापार्श्वा रोमाणः कुशविन्दवः ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
वनाय़ुजानां शुभ्राणां तथा पर्वतवासिनाम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
वनाय़ुजान्पार्वतीय़ान्काम्वोजारट्टवाह्लिकान् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
वनाय़ुजान्पार्वतीय़ान्काम्वोजारट्टवाह्लिकान् |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
वनाय़ुजान्सुकुमारस्य शुभ्रा; नलङ्कृताञ्जातरूपेण शीघ्रान् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
वने काक इवावुद्धिर्वाशमानो निरर्थकम् ||
७ ग
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
वने काश्चिज्जले काश्चित्काश्चिद्वेश्मसु चाङ्गनाः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
वने कुटुम्वधर्माणो दृश्यन्ते परिमोहिताः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
वने गुरुसकाशे वा यतिधर्मेण वा पुनः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
वने ग्राम्यसुखाचारो यथा ग्राम्यस्तथैव सः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
वने घोरे महाराज नाशय़िष्यामि ते क्लमम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
वने च तं परिध्वंसं प्रेक्ष्य चिन्तामुपेय़िवान् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
वने चरति यो धर्ममाश्रमेषु च भारत |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
उलूप्यु उवाच
वने चरेद्व्रह्मचर्यमिति वः समय़ः कृतः ||
२५ ग
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
वने चास्मिन्महाघोरे सिंहव्याघ्रनिषेविते ||
२५ ग
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
वने जनपदेऽज्ञातैरेष एव पणो हि नः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
वने जाताः शापदग्धस्य राज्ञः; पाण्डोः पुत्राः पञ्च पञ्चेन्द्रकल्पाः |
१०३ क
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
वने तु तस्य वसतः कन्या जज्ञेऽप्सरःसमा |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
वने तेऽभिय़युः पार्थान्क्रोधामर्शसमन्विताः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
वने ददर्श विप्रेन्द्रमृषिं वंशधरं भृगोः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
वने दुःखं च यत्प्राप्तमस्माभिस्त्वत्कृतं महत् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
वने द्वादश वर्षाणि वासाय़ोपजगाम ह ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२३५
वैशम्पाय़न उवाच
वने द्वैतवने तस्मिन्विजहार मुदा युतः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
वने निवसतां तेषां पाण्डवानां महात्मनाम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
वने निवसतां नित्यं कन्दमूलफलाशिनाम् ||
८२ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वृहदश्व उवाच
वने निवसतो राजञ्शिष्यन्ते स्म कदाचन ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
वने पञ्चत्वमगमत्सुकृतेन च तेन वै |
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
वने पुण्यकृतां श्रेष्ठः स्वादुमूलफलोदके ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
वने महति कस्मिंश्चिदमनुष्यनिषेविते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
वने महति कस्मिंश्चिन्न्यग्रोधः सुमहानभूत् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
वने महति तस्मिंस्तु रामः सौमित्रिणा सह |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
वने महति दुष्टात्मा दृष्टो भीमवलाद्धतः ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
व्यास उवाच
वने मूलफलाशी च तप्यन्सुविपुलं तपः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
वने मैथुनकालस्थं ददर्श मृगय़ूथपम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
वने वनचरः कश्चिज्जाजलिर्नाम वै द्विजः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
वने वसन्नतिथिष्वप्रमत्तो; धुरन्धरः पुण्यकृदेष तापसः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
वने विचरतां तेषामेकं जग्राह पक्षिणम् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
वने विचरतो राजन्नस्थि भित्त्वास्फुरत्तदा ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
वने विचरितं सर्वमूषतुर्मुदितौ नृप ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
वने विजह्रिरे पार्थाः शक्रप्रतिमतेजसः ||
३ ख
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
वने शून्ये विचरंश्चिन्तय़ानो; भूमौ ततः संविवेशाग्र्यतेजाः ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
वने स मुनिभिः सर्वैः पूज्यमानो महातपाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
वने संरक्षितो गोभिः सोऽभिरक्षतु मां मुने ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
वने समा द्वादश राजपुत्र; यथाकामं विदितमजातशत्रो |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
वने सृगालः पिशितस्य तृप्तो; मा पार्थमासाद्य विनङ्क्ष्यसि त्वम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
वने स्थितान्पार्थिवपुत्रपौत्रा; ञ्श्रुत्वा तदा दुःखनदीं प्रपन्नान् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
वने स्मरन्वासमिमं सुघोरं; शेषं न कुर्यादिति निश्चितं मे ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
वनेचरस्य किमिदं कामेनालोड्यते मनः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
वनेषु तेष्वेव तु ते नरेन्द्राः; सहार्जुनेनेन्द्रसमेन वीराः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
वनेषु मृगराजेषु सिंहविप्रोषितेषु च |
१० क