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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
शशश्चाशु विनिर्भिद्य मण्डलं शशिनोऽपतत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
व्राह्मण उवाच
शशाङ्ककरसंस्पर्शैर्हृद्यैरात्मप्रकाशितैः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
शशाङ्कसंनिकाशान्वै वाजिनोऽचूचुदद्भृशम् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
शशाङ्कसंनिकाशैश्च वदनैश्चारुकुण्डलैः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १९३
मार्कण्डेय़ उवाच
शशादस्य तु दाय़ादः ककुत्स्थो नाम वीर्यवान् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
शशाप च महातेजाः सर्वलोकेषु च स्त्रिय़ः |
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
शशाप ज्वलनः सर्वान्द्विरदान्क्रोधमूर्छितः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
शशाप तं च सङ्क्रुद्धो वीभत्सुर्जिह्मगामिनम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
शशाप तं ततः क्रुद्ध एवमुक्तो वृहस्पतिः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
शशाप तं वैश्रवणो न त्वामेतद्वहिष्यति ||
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
शशाप तत्र भीमस्तु राजमध्ये महास्वनः |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
शशाप तानपि क्रुद्धो यय़ातिस्तनय़ानथ ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
शशाप पुत्रं गान्धारे राज्याच्च व्यपरोपय़त् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
शशाप रथिनां मध्ये धृष्टद्युम्नो महामनाः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
शशाप वलवत्क्रुद्धो नहुषं पापचेतसम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
शशाप शुकमग्निस्तु वाग्विहीनो भविष्यसि |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
शशाप स तमासाद्य न रसान्वेत्स्यसीति वै ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६
सूत उवाच
शशापाग्निमभिक्रुद्धः सर्वभक्षो भविष्यसि ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
शशापाथ स तच्छ्रुत्वा पितरं ते रुषान्वितः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
शशास चैव भगवान्कालेनैतावता पुनः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
शशास पुरुषान्काले रथान्योजय़तेति ह ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय ४०
सूत उवाच
शशास राज्यं कुरुपुङ्गवाग्रजो; यथास्य वीरः प्रपितामहस्तथा ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २६०
मार्कण्डेय़ उवाच
शशास वरदो देवो देवकार्यार्थसिद्धय़े ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
शशास शिष्यमासीनं वैशम्पाय़नमन्तिके ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
शशास शिष्यमासीनं वैशम्पाय़नमन्तिके ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
शशास सर्वां पृथिवीं हैहय़ः सत्यविक्रमः ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
शशासोच्चैः पुरुषान्पुत्रवाक्ये; स्थितो राजा दैवसंमूढचेताः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
शशिकान्तां शिवां चैव तथा वीरवतीमपि |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शशिप्रकाशाननमर्जुनो यदा; क्षुरेण कर्णस्य शिरो न्यपातय़त् |
५१ क
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
शशिप्रभा खेचरीणां कैलासशिखरोपमा ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
शशोलूकमुखी कृष्णा खरजङ्घा महाजवा ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
इन्द्र उवाच
शश्वदक्षरपर्यन्तमक्षरं सर्वतोमुखम् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
शश्वद्धर्मात्मना जातो वाल एव पिता मम |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
शश्वद्धर्मात्मनां मुख्ये कुले जातस्य भारत |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
शश्वद्रूपं महद्विभ्रन्महापुरुष उच्यते ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
शशय़ानं च राजेन्द्र तीर्थमासाद्य दुर्लभम् |
१२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
शष्पं मृगमुखोत्सृष्टं यो मृगैः सह सेवते |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
शष्पाणीव विचिन्वन्तमन्यत्रगतमानसम् |
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
शस्त्रं गृहीत्वा निशितं सर्वगात्राण्यकृन्तत ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
शस्त्रं चाहं रणे जह्यां श्रुत्वा सुमहदप्रिय़म् |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
शस्त्रं त्यक्त्वा ततो मूर्ध्ना प्रसादाय़ोपचक्रमे ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
शस्त्रं नैव ग्रहीष्यामो न वधिष्याम कञ्चन ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
शस्त्रग्रहणचापल्यं संवृणोति भय़ादिति ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
शस्त्रग्रहणविद्यासु वह्वीषु परिनिष्ठितम् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
शस्त्रग्रहणविद्यासु सर्वासु परिनिष्ठितम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
शस्त्रधारणमत्युग्रं तच्च कार्यं कृतं त्वय़ा ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
शस्त्रपाणींस्तथा वाहूंस्तथापि च शिरांस्युत ||
१०१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
शस्त्रपूता दिवं प्राप्ता न ताञ्शोचितुमर्हसि ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
शस्त्रपूतां हि स गतिं गतः परपुरञ्जय़ः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
शस्त्रप्रतापतप्तानां मज्जा सीदति देहिनाम् ||
२५ ख