शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
विना राज्ञः प्रवेशाद्वै किमसि त्वमिहागतः |
८५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
विना वधं न कुर्वन्ति तापसाः प्राणय़ापनम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
विना सिद्धगतिं वीर गतिरत्र न विद्यते ||
७९ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
विना हंसेन लोकेऽस्मिन्नाहं जीवितुमुत्सहे |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
विनाग्निना प्रजाः सर्वास्तत आसन्सुदुःखिताः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
विनाद्य खं दिवमपि चैव सर्वश; स्ततो गताः सलिलधरा यथागतम् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
विनादय़ामास ततो दिशश्च; स पाञ्चजन्यस्य रवेण शौरिः ||
१०२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
विनाभूतः स गदय़ा जरासन्धो महामृधे |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
७९
जनमेजय़ उवाच
विनाभूता वने वीराः कथमासन्पितामहाः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
विनालनलिनाकारैर्दिवाकरशशिप्रभैः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१०१
देवा ऊचुः
विनाशं नाधिगच्छेय़ुस्त्वय़ा वै परिरक्षिताः ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
विनाशं पश्यमानो हि सर्वराज्ञां गदाग्रजः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
विनाशं पाण्डुपुत्राणां विललाप सुदुःखितः ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
विनाशं यास्यति क्षिप्रं कल्याणी पृथुलोचना ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
विनाशं ह्येव पश्यामि कुरूणामनुचिन्तय़न् ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
विनाशः कुरुमुख्यानां शल्यपर्वणि कीर्त्यते ||
१७४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
विनाशः सर्वभूतानां कालपर्याय़कारितः ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
विनाशः सर्वलोकस्य सानुवन्धो भविष्यति ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
विनाशनश्च क्रोधश्च हन्ता क्रोधस्य चापरः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
विनाशनस्तु चन्द्रस्य य आख्यातो महासुरः |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
विनाशमरिसैन्यानां कर्णस्य च वधं तथा ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
विनाशमुखमुत्पन्नं धृतराष्ट्रमुपाद्रवत् ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
विनाशमुखमेतत्ते केनाख्यातं दुरात्मना ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
विनाशमुपय़ास्यन्ति मच्छरौघनिपीडिताः ||
४१ ख
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
विनाशमुपय़ास्यन्ति शलभा इव पावकम् ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
विनाशमेति वै क्षिप्रं तथा नीतिर्विधीय़ताम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
विनाशश्चाप्यनर्होऽस्य सुखं प्राप्स्यथ मानुषाः |
८७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
विनाशस्यातिघोरस्य नरवारणवाजिनाम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
विनाशहेतवः सर्वे प्रत्युपस्थितमृत्यवः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
काल उवाच
विनाशहेतुः कर्मास्य सर्वे कर्मवशा वय़म् ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
विनाशहेतुकारित्वे यैस्ते कालवशं गताः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
विनाशहेतुर्नास्य त्वमहं वा प्राणिनः शिशोः ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
विनाशाय़ समुत्पन्नं महाघोरं महास्वनम् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
विनाशाय़ाभिसन्धाय़ गदामादत्त वीर्यवान् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
विनाशाय़ास्य दुर्वुद्धेः पौलस्त्यकुलघातिनः ||
६१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
विनाशाय़ैव गच्छन्ति तथा मे सैनिको जनः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
विनाशिनो ह्यध्रुवजीवितस्य; किं वन्धुभिर्मित्रपरिग्रहैश्च |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
विनाशे कारणं त्वं च तस्माद्वध्योऽसि मे मतः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
विनाशे तस्य पुत्राणामिदं राज्यमरिन्दम |
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
विनाशे धार्तराष्ट्राणां किं फलं भरतर्षभ ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
विनाशे शाल्वराजस्य तदैवाकरवं मतिम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
विनाशेऽपि स एवास्य सन्दिग्धं कर्म पौरुषम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
विनाशय़ति सम्भूतमय़स्मय़मय़ो यथा |
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
विनाशय़ति सम्भूता अय़ोनिज इवानलः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
विनाशय़िष्यामि ततः सर्वान्सौभनिवासिनः ||
८७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
विनाशय़ेद्वा सर्वस्वं वलेनाथ स्वकेन वै ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
विनिःश्वसत्युष्णमतीव घोरं; दहन्निवेमान्मम पुत्रपौत्रान् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
विनिःश्वसन्तं मुहुरूर्ध्वदृष्टिं; विभाण्डकः पुत्रमुवाच दीनम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
विनिःश्वसन्तः प्राक्रोशन्क्वेदानीं स धनञ्जय़ः ||
३ ख