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वन पर्व
अध्याय २९८
वैशम्पाय़न उवाच
ददानीत्येव भगवानुत्तरं प्रत्यपद्यत |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
ददानीत्येव योऽवोचन्न नास्तीत्यर्थितोऽर्थिभिः |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
ददानीत्येव वरुणः पावकं प्रत्यभाषत ||
४ ग
विराट पर्व
अध्याय ३२
विराट उवाच
ददान्यलङ्कृताः कन्या वसूनि विविधानि च |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
ददामि किं चापि मनःप्रणीतं; प्रिय़ातिथे तव कामान्वृणीष्व ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
भीम उवाच
ददामि ते ग्रामवरांश्चतुर्दश; प्रिय़ाख्याने सारथे सुप्रसन्नः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
ददामि ते वरं सौम्य विना पार्थं धनञ्जय़म् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
इन्द्र उवाच
ददामि ते वैजय़न्तीं मालामम्लानपङ्कजाम् |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय ७
विराट उवाच
ददामि ते हन्त वरं महानसे; तथा च कुर्याः कुशलं हि भाषसे |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ६
विराट उवाच
ददामि ते हन्त वरं यमिच्छसि; प्रशाधि मत्स्यान्वशगो ह्यहं तव |
११ क
विराट पर्व
अध्याय १०
विराट उवाच
ददामि ते हन्त वरं वृहन्नडे; सुतां च मे नर्तय़ याश्च तादृशीः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
ददामि देय़मित्येव यजे यष्टव्यमित्युत ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
गौतम उवाच
ददामि पत्नीं कन्यां च स्वां ते दुहितरं द्विज |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
व्रह्मो उवाच
ददामि मेदिनीभागं भवद्भ्योऽहं सुरर्षभाः |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ११
विराट उवाच
ददामि यानानि धनं निवेशनं; ममाश्वसूतो भवितुं त्वमर्हसि |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
राजो उवाच
ददामि वसु किञ्चित्ते प्रार्थितं तद्वदस्व मे ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
ददामि वुद्धिय़ोगं तं येन मामुपय़ान्ति ते ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
ददावथ विषं पापो भीमाय़ धृतराष्ट्रजः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
ददावनलपुत्राय़ वासवः परवीरहा |
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
ददावनुचरौ मेरुरग्निपुत्राय़ भारत ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
ददावनुचरौ शूरौ परसैन्यप्रमाथिनौ ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
ददावर्धासनं प्रीतः शक्रो मे ददतां वरः |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
ददासि चेद्वरं मह्यं जीवग्राहं युधिष्ठिरम् |
६ क
सभा पर्व
अध्याय ६३
द्रौपद्यु उवाच
ददासि चेद्वरं मह्यं वृणोमि भरतर्षभ |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
उत्तङ्क उवाच
ददासि विप्रमुख्येभ्यस्त्वं हि रत्नानि सर्वशः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
ददाह कार्तवीर्यस्य शैलानथ वनानि च ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
ददाह कुञ्जरांश्चैव सिंहांश्चैव विनिःसृतान् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
ददाह खाण्डवं क्रुद्धो युगान्तमिव दर्शय़न् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय २२३
वैशम्पाय़न उवाच
ददाह खाण्डवं चैव समिद्धो जनमेजय़ ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
धृतराष्ट्र उवाच
ददाह च शरैर्द्रोणः पाञ्चालानां रथव्रजान् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
ददाह तद्वनं घोरं मृगपक्षिसमाकुलम् ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
ददाह तद्वनं सर्वं परिगृह्य समन्ततः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
ददाह पवनेनेद्धश्चित्रभानुः सहैहय़ः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
ददाह पावकः क्रुद्धो युगान्ताग्निसमप्रभः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
ददाह पावको राजन्भगवत्कोपसम्भवः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ११७
अकृतव्रण उवाच
ददाह पितरं चाग्नौ रामः परपुरञ्जय़ः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
ददाह पृथिवीं सर्वां सप्तद्वीपां सपत्तनाम् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
ददाह भगवान्वह्निर्भूतानीव युगक्षय़े ||
८२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
ददाह भगवान्वह्निर्भूतानीव युगक्षय़े ||
९७ ख
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
ददाह भरतश्रेष्ठ सर्वलोकाभय़ाय़ वै ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १७२
गन्धर्व उवाच
ददाह वितते यज्ञे शक्तेर्वधमनुस्मरन् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
ददाह समरे योधान्कक्षमग्निरिव ज्वलन् ||
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
ददाह सर्वां तव पुत्रसेना; ममृष्यमाणस्तरसा तरस्वी ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
ददाह सह कृष्णाभ्यां जनय़ञ्जगतोऽभय़म् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
ददाह सुमहातेजा मन्दवुद्धीन्स सागरान् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १६९
वसिष्ठ उवाच
ददुः केचिद्द्विजातिभ्यो ज्ञात्वा क्षत्रिय़तो भय़म् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
ददुः श्राद्धं तदा पाण्डोः स्वधामृतमय़ं तदा ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
ददुः सेनागणाध्यक्षाञ्शूलपट्टिशधारिणः |
५० क
सभा पर्व
अध्याय ४६
दुर्योधन उवाच
ददुर्वासांसि मेऽन्यानि तच्च दुःखतरं मम ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
ददुस्तेषामावसथान्धर्मराजस्य शासनात् |
१८ क