आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
अवमानः प्रय़ुक्तोऽय़ं त्वय़ा मम भुजङ्गमे |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
अम्वो उवाच
अवमानभय़ाच्चैव व्रीडय़ा च महामुने ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
अवमानभय़ादेतत्स्वधर्मस्य च रक्षणात् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
अवमानमहं प्राप्य न योत्स्यामि कथञ्चन |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
दुर्योधन उवाच
अवमानश्च यत्र स्यात्क्षत्रिय़स्य विशां पते |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
अवमानाः सुकष्टाश्च परतः स्वजनात्तथा |
३४ क
सभा पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
अवमानाच्च लोकस्य व्याय़तत्वाच्च धर्षितः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
अवमानेन युक्तस्य स्थापितस्य च मे पुनः |
७६ क
सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
अवमुच्य किरीटं स केशान्समनुमृज्य च |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
अवमृद्नन्स राष्ट्राणि पार्थिवानां हय़ोत्तमः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
अवमेने च तां दृष्ट्वा सर्वप्राणभृतां वपुः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
अवमेने च पितरं भ्रातॄंश्चाप्यपराजितः ||
८ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
अवमेने धनुर्ग्राहानेष सर्वांश्च फल्गुनः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
अवमेने नरान्सर्वान्देवानृषिगणांस्तथा |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
अवमेने स तु क्षत्रं दर्पपूर्णः सुमन्दधीः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
अवमेने हि दुर्वुद्धिर्मनुष्यान्पुरुषादकः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अवरा पतिता चैव न ग्राह्या भूतिमिच्छता ||
१२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
अवराणां समानानां शिष्याणां च समाचरेत् ||
२७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
अवराणां समानानामुभय़ेषां न दुष्यति ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अवरुद्धश्चरन्पार्थो दशवर्षाणि त्रीणि च |
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
अवरुद्धा वलिनः केकय़ेभ्यो; महेष्वासा भ्रातरः पञ्च सन्ति |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
अवरुह्य रथात्तं तु ह्रिय़माणं वलीय़सा |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
अवरुह्य रथात्तूर्णं पद्भ्यामेव कृताञ्जलिः ||
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
अवरुह्य रथोपस्थात्त्वरमाणोऽभिदुद्रुवे ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२९
भीष्म उवाच
अवरोधाज्जुगुप्सेत का सपत्नधने दय़ा |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
अवरोपय़ गाण्डीवमक्षय़्यौ च महेषुधी |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
अवर्जनीय़ास्तेऽर्था वै काङ्क्षिताश्च ततोऽन्यथा ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
अवर्जय़त सङ्ग्रामे युगान्ताग्निमिवोल्वणम् ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
अवर्जय़त सङ्ग्रामे स्त्रीत्वं तस्यानुसंस्मरन् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
अवर्णकारिणं सत्सु कुलवंशस्य नाशनम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
अवर्तत महाघोरो निवातकवचान्तकः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
अवर्तत महारौद्रं निघ्नतामितरेतरम् |
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
अवर्तत महारौद्रः सततं समितिक्षय़ः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
अवर्तन्कलहाश्चात्र दिवारात्रं गृहे गृहे ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
अवर्तन्त द्विजाग्र्याणां दारेषु भरतर्षभ ||
६१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अवर्तन्त यथादेशं राजञ्शान्तनवस्य ते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
अवर्धं त्रीन्समाक्रम्य लोकान्वै स्वेन तेजसा ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
अवर्धत महाराज यथाग्निरनिलोद्धतः ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
अवर्धत महीपाल किष्कूणां च त्रय़ोदश ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अवर्धत यथाकालं शुक्लपक्षे यथा शशी ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
अवर्धन्त च भोगांस्ते भुञ्जानाः पितृवेश्मनि ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अवर्षं चातिवर्षं च व्याधिपावकमूर्छनम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
युधिष्ठिर उवाच
अवर्षति च पर्जन्ये मिथो भेदे समुत्थिते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
अवर्षति च पर्जन्ये सर्वभूतानि चासकृत् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
२२१
शार्ङ्गका ऊचुः
अवर्हान्मांसभूतान्नः क्रव्यादाखुर्विनाशय़ेत् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२२१
वैशम्पाय़न उवाच
अवर्हाश्चरणैर्हीनाः पूर्वेषां नः पराय़णम् |
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
अवलं तन्महद्भूतं यस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
अवलं वलिनो जघ्नुर्निर्मर्यादमवर्तत ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
अवलं वै वलाच्छ्रेय़ो यच्चातिवलवद्वलम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
अवलस्य कुतः कोशो ह्यकोशस्य कुतो वलम् |
४ क