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शान्ति पर्व
अध्याय १३१
भीष्म उवाच
अवलस्य कुतो राज्यमराज्ञः श्रीः कुतो भवेत् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
अवला वै विनश्यन्ति मुच्यन्ते च वलान्विताः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
अवलाः स्वल्पकौपीनाः सुहृदः सत्यजिष्णवः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
अवलानभिय़ुञ्जीत न तु ये वलवत्तराः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
अवलाश्च मृगा राजन्वागुरासु तथापरे |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २१३
कन्यो उवाच
अवलाहं महावाहो पतिस्तु वलवान्मम |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
देव्यु उवाच
अवलिप्तं मे मुखं व्रह्मन्पुण्यान्गन्धान्विभर्मि च |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
अवलिप्तस्य मूर्खस्य केशवं स्तोतुमिच्छतः |
५ क
वन पर्व
अध्याय १९७
व्राह्मण उवाच
अवलिप्ते न जानीषे वृद्धानां न श्रुतं त्वय़ा |
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
अवलिप्तेषु मूर्खेषु रौद्रसाहसिकेषु च |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
अवलिप्तैर्नरैर्व्रह्मन्मरिष्यामि न संशय़ः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
अवलुप्य जटामेकां जुहावाग्नौ सुसंस्कृते ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
अवलुप्यापरां चाथ जुहावाग्नौ जटां पुनः ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
अवलेपाद्वधार्हस्य समग्रे राजमण्डले ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
अवलेपेन महता परिदृव्धा विचेतसः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय २१०
वैशम्पाय़न उवाच
अवलोकेषु नारीणां सहस्राणि शतानि च |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
अवलोक्य ततः पश्चाद्दध्यौ व्रह्म सनातनम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अवलोक्यो न चादर्शो मलिनो वुद्धिमत्तरैः |
७१ क
विराट पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अवलोकय़न्ती ददृशे प्रासादाद्द्रुपदात्मजाम् ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
अववद्धशिरस्त्राणः सङ्ख्ये काञ्चनवर्मभृत् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
अववन्धो हि मुक्तस्य कर्मभिर्नोपपद्यते ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
अववुध्यात्मनात्मानं सत्यं शीलं श्रुतं दमम् |
४६ क
विराट पर्व
अध्याय २१
द्रौपद्यु उवाच
अववोधाद्धि भीतास्मि गन्धर्वाणां यशस्विनाम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
अवशः कार्यते तत्र तस्मिंस्तस्मिन्गुणे स्थितः ||
१४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
अवशस्य विनाशाय़ शरीरमपकृष्यते ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अवशस्य स्थितं हस्ते तं खड्गं सत्सरुं तदा ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
अवशाः पूरय़न्ति स्म सर्वकामसमृद्धिभिः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
अवशानि विनष्टानि पन्नगानां द्विजोत्तम ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१४
भीष्म उवाच
अवशिष्टं तु योऽश्नाति तमाहुर्विघसाशिनम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २४५
वैशम्पाय़न उवाच
अवशिष्टमल्पकालं मन्वानाः पुरुषर्षभाः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
अवशिष्टस्त्वमेवैकः कुलघ्नोऽधमपूरुषः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११
शकुनिरु उवाच
अवशिष्टानि येऽश्नन्ति तानाहुर्विघसाशिनः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
अवशिष्टानि यो भुङ्क्ते तमाहुर्विघसाशिनम् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
अवशिष्टेषु वर्षेषु वक्ष्यामि मनुजेश्वर |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २३
धृतराष्ट्र उवाच
अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ||
१०६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
अवशेषाणि चान्यानि त्रीणि कर्माणि यानि तु |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अवशेषाणि चाश्नन्ति नित्यं सत्यतपोरताः ||
४२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
अवशेषास्तु निहता द्रोणपुत्रेण वै निशि ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
अवशो मुह्यते पार्थ यथा त्वं मूढ एव तु ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
अवशोऽहं पुरा तात पुत्राणां निहते शते |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
च्यवन उवाच
अवश्यं कथनीय़ं मे तवैतन्नरपुङ्गव |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
विष्णुरु उवाच
अवश्यं करणीय़ं मे भवतां हितमुत्तमम् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
अवश्यं कूजितव्यं वा शङ्केरन्वाप्यकूजतः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
अवश्यं कूजितव्यं वा शङ्केरन्वाप्यकूजनात् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २०६
व्याध उवाच
अवश्यं क्रिय़माणस्य कर्मणो दृश्यते फलम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २२४
वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यं च त्वय़ा भूमिरिय़ं निहतकण्टका |
६ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यं चापि गन्तव्या त्वय़ा द्वारवती पुरी ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
अवश्यं जनय़त्येव सर्वकर्मसु संशय़ान् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
अवश्यं तत्समाप्नोति पुरुषो नात्र संशय़ः ||
५ ख