द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
तं धनञ्जय़गोप्तारं प्रपद्य सुखमेधते ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
तं धनौघमपर्यन्तं रत्नसागरमक्षय़म् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
तं धर्ममसुरास्तात नामृष्यन्त जनाधिप |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
तं धर्मराजो दृष्ट्वैव नमस्कृत्य नरर्षभम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
तं धर्मराजो धर्मज्ञं पूजय़ित्वा प्रतापवान् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तं धर्मराजो वहुभिर्मर्मभिद्भिरवाकिरत् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
तं धर्मराजो विमना इवाव्रवी; त्सर्वे ह्रिय़ा सन्ति तपस्विनोऽमी |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
तं ध्यानमूकं कृपणं भृशार्त; मार्ताय़निर्दीनमुवाच वाक्यम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
तं न देवा न गन्धर्वा न यक्षा न च राक्षसाः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
तं न भेतव्यमित्याह ततो भूमिगतं नृपम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
तं न वित्तपतिर्नेन्द्रो न यमो न जलेश्वरः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
तं न वुध्यसि गोविन्दं घोरविक्रममच्युतम् |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१५
वैशम्पाय़न उवाच
तं न शक्नोम्यहं दग्धुं रक्ष्यमाणं महात्मना ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
तं नर्मदा देवनदी पुण्या शीतजला शिवा |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
तं नागराजं सहसा प्रणुन्नं; विद्राव्यमाणं च निगृह्य शाल्वः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
तं नागस्तक्षकः क्रुद्धस्तेजसा सादय़िष्यति |
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तं नामृष्यत सङ्क्रुद्धो व्यवसाय़ं युधिष्ठिरः ||
११ ग
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
तं निघ्नन्तं महातेजा वभ्रुः परपुरञ्जय़ः |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
तं निमग्नं नरव्याघ्रं भीष्मं शंससि सञ्जय़ ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तं निर्जित्य रणे राजन्नुलूकस्त्वरितो यय़ौ |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२२८
वैशम्पाय़न उवाच
तं निर्यान्तं महावाहुं द्रष्टुं द्वैतवनं सरः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
तं निवार्य शरैस्तूर्णं धृष्टद्युम्नो महारथः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
१०२
देवा ऊचुः
तं निवारय़ितुं शक्तो नान्यः कश्चिद्द्विजोत्तम |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६७
गन्धर्व उवाच
तं निवारय़ितुं शक्तो नान्योऽस्ति भुवि कश्चन |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
तं निवृत्तं तु शुश्राव चारेणैव युधिष्ठिरः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
तं निषूदय़ सन्दुष्टं दैत्यं रौद्रपराक्रमम् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
तं निहत्य गदाग्रेण लेभे स परमं यशः |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
तं निहत्य ततः पार्थः सुशर्माणं त्रिभिः शरैः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
तं निहत्य प्रलुव्धोऽय़ं शिखण्डी पूर्णमानसः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
तं निहत्य महाराज भीमसेनो महावलः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
तं निहत्य महाराज वनं त्वं गन्तुमर्हसि ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
तं निहत्य महेष्वासो युधिष्ठिरमुपागमत् |
६१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
तं निहत्य रणे शूरः शैनेय़ो रथसत्तमः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
तं निहत्य रणे हृष्टो वृहत्क्षत्रो महारथः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
तं निहत्य शितैर्वाणैर्मित्रवर्माणमाक्षिपत् |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तं नूनमेष धावन्तं जिघृक्षति धनञ्जय़ः ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
तं नृपं दीनमनसं निहतज्ञातिवान्धवम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
तं नृपं नृपतिश्रेष्ठ पितरं धार्मिकं तव ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
तं नृपं नृपशार्दूल विप्रैक्षन्त परस्परम् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
तं नृशंसेन पापेन क्रूरेणात्यल्पदर्शिना |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
तं न्यस्य वेद्यां कलशं सुषुपुस्ते महर्षय़ः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९९
नारद उवाच
तं नय़िष्यामि देशं त्वां रुचिं यत्रोपलप्स्यसे ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तं पञ्चतालोच्छ्रिततालकेतुः; सदश्ववेगोद्धतवीर्ययातः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तं पटच्चरहन्तारं लक्ष्मणः समवारय़त् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तं पटच्चरहन्तारं शुकवर्णावहन्हय़ाः ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
तं पतन्तं महावाहो शूलपट्टिशपाणय़ः |
२८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
तं पतन्तमभिक्रम्य परिजग्राह सात्यकिः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३०
भीष्म उवाच
तं पतन्तमभिद्रुत्य परिजग्राह वासवः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तं पतन्तमभिप्रेक्ष्य महात्मानं पितामहम् |
८३ क
आदि पर्व
अध्याय
२२२
जरितो उवाच
तं पतन्तमहं श्येनं त्वरिता पृष्ठतोऽन्वगाम् |
६ क