chevron_left  आत्मदोषैर्निय़च्छन्तिarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मदोषैर्निय़च्छन्ति सर्वे दुःखसुखे जनाः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
आत्मनः कर्मदोषाणि न विजानात्यपण्डितः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
आत्मनः कामकारेण सोऽपि हंसः प्रजाय़ते ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
आत्मनः परिमर्शेन वुद्धिं वुद्ध्या विचारय़ेत् |
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनः पावनं कुर्वन्व्राह्मणेभ्यो ददौ वसु ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनः पौरुषं चैव वलं च न समं परैः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
आत्मनः प्रतिरूपाणि रूपाण्यथ महात्मनि |
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
आत्मनः प्रतिरूपैस्तैर्नानारूपैर्विमोहिताः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनः प्रतिरूपोऽसौ लव्धः पतिरिति स्थिते |
५५ क
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
आत्मनः प्रसवस्यार्थे नापश्यत्सदृशीं स्त्रिय़म् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
भीष्म उवाच
आत्मनः संनिरोधेन सन्धिं तेनाभिय़ोजय़ेत् ||
५ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
आत्मनः सदृशं प्राज्ञं नैषोऽमन्यत कञ्चन |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनः सदृशं सा तु भर्तारं नान्वपश्यत ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
आत्मनः सम्प्रदानेन मर्त्यो मृत्युमुपाश्नुते ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११४
वृहस्पतिरु उवाच
आत्मनः सुखमन्विच्छन्न स प्रेत्य सुखी भवेत् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २५
शल्य उवाच
आत्मनः स्तवसंय़ुक्तं तन्निवोध यथातथम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
आत्मनश्च तपोभाग्यं महाभाग्यं तथैव च ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनश्च परेषां च पाण्डवानां च निश्चय़म् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
आत्मनश्च परेषां च वृत्तिं संरक्ष भारत ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
आत्मनश्च मतं वीर कथितं भवतासकृत् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनश्च विजानीहि निय़मव्रतशीलताम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
आत्मनश्च समाधाने धारणां प्रति चाभिभो |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
व्यास उवाच
आत्मनश्च हृदि श्रेय़स्त्वन्विच्छ मनसात्मनि ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
आत्मनश्चपलो नास्ति कुतोऽन्येषां भविष्यति |
१४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
आत्मनश्चापि वोद्धव्याश्चाराः प्रणिहिताः परैः ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय १३१
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनश्चासहाय़त्वं तथेति प्रत्युवाच तम् ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनश्चैव भद्रं ते कुरु मानं कुलस्य च ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय ११५
अकृतव्रण उवाच
आत्मनश्चैव मातुश्च प्रसादं च चकार सः ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
आत्मनश्चैव शत्रोश्च शक्तिं शास्त्रविशारदः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ८३
यय़ातिरु उवाच
आत्मनस्तपसा तुल्यं कञ्चित्पश्यामि वासव ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
आत्मनस्तु क्रिय़ोपाय़ो नान्यत्रेन्द्रिय़निग्रहात् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
आत्मनस्तु ततः श्रेय़ो भार्गवात्सुमहाय़शाः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
आत्मनस्तु ततः सूतो हय़ानां च विशां पते |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १४९
व्राह्मण उवाच
आत्मनस्तु मय़ा श्रेय़ो वोद्धव्यमिति रोचय़े |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
आत्मनस्तु हितं मुख्यं प्रतिकर्तव्यमद्य मे |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
आत्मना करणैश्चैव समस्येह महीक्षितः |
१३२ क
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मना च महावाहुरेकपादस्थितोऽभवत् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मना चात्मनः पञ्च पीडय़न्नानुपीड्यते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
आत्मना चापि जानासि यद्दुःखं वधताडने ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
नारद उवाच
आत्मना प्राप्तमैश्वर्यमन्यत्र प्रतिपादितम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मना भ्रातृभिश्चाहं धर्मेण सुकृतेन च |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
आत्मना यत्कृतं कृत्स्नं शाखानामपकर्षणम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुड्यसमानि तु |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
आत्मना विहितं दुःखमात्मना विहितं सुखम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
आत्मना सप्तमं कामं हत्वा शत्रुमिवोत्तमम् |
५२ क
वन पर्व
अध्याय २५१
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मना सप्तमः कृष्णामिदं वचनमव्रवीत् ||
८ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मना सप्तमो राजा निर्ययौ गजसाह्वय़ात् |
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
आत्मना सूक्ष्ममात्मानं युङ्क्ते सम्यग्विशां पते ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
आत्मना हि कृतं कर्म आत्मनैवोपभुज्यते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
आत्मनां च सहस्राणि वहूनि भरतर्षभ |
२६ क