उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
त्वमेवाग्ने हव्यवाहस्त्वमेव परमं हविः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
त्वमेवाद्य फलं भुङ्क्ष्व कृत्वा किल्विषमात्मना ||
२ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
इन्द्र उवाच
त्वमेवान्यान्दहसे जातवेदो; न हि त्वदन्यो विद्यते भस्मकर्ता |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
ऋषय़ ऊचुः
त्वमेवार्हसि कल्याण वक्तुं वह्नेर्विनिर्गमम् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
त्वमेवार्हसि नो देवि स्त्रीधर्ममनुशासितुम् ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेवेह युगान्तेषु निधनं प्रोच्यसेऽनघ ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२३
सारिसृक्व उवाच
त्वमेवैकस्तपसे जातवेदो; नान्यस्तप्ता विद्यते गोषु देव |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
त्वमेवैको जातपुत्रेषु राज; न्वशं गन्ता सर्वलोके नरेन्द्र |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
त्वमेवैतत्प्रज्ञय़ाजातशत्रो; शमं कुर्या येन शर्माप्नुय़ुस्ते |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
त्वमेवैतत्सर्वमतश्च भूय़ः; समीकुर्याः प्रज्ञय़ाजातशत्रो |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वासुदेव उवाच
त्वमेवैतन्महावाहो वक्तुमर्हस्यरिन्दम |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
वलिरु उवाच
त्वमेवैनां पृच्छ मा वा यथेष्टं कुरु वासव ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
गरुड उवाच
त्वमेषां किल सर्वेषां विशेषाद्वलवत्तरः ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
त्वरंस्ततो धर्मसुतो महात्मा; शल्यस्य क्रुद्धो नवभिः पृषत्कैः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
त्वरते मे मतिस्तात त्वय़ि युद्धाभिकाङ्क्षिणि |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
त्वरध्वं कुरवः सर्वे वधे कृष्णकिरीटिनोः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
त्वरध्वं सर्वतो यत्ता राधेय़स्य रथं प्रति ||
१६ ग
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वरन्गाण्डीवनिर्मुक्तैरर्जुनस्तस्य वाजिनः |
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
त्वरन्नेकरथेनैव वहुकृत्यं विचिन्तय़न् ||
१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
त्वरन्नेकरथेनैव समेत्य द्रोणमव्रवीत् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
त्वरन्प्राच्छादय़द्वाणैः शलभानामिव व्रजैः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
त्वरन्सेनापतिः क्रुद्धो विभेद गदय़ा शिरः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
त्वरमाणः परं शक्त्या गौतमग्रहणाय़ वै ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणः पुनः कृष्णः पार्थमभ्यवदच्छनैः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वरमाणः शरानस्यन्पाण्डवः स वभौ रणे |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१२७
लोमश उवाच
त्वरमाणः स चोत्थाय़ सोमकः सह मन्त्रिभिः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणः समभ्येत्य सर्वांस्तानव्रवीन्नृपान् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
त्वरमाणः स्वय़ं याहि न चासौ त्वां सहिष्यते ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
त्वरमाणश्च भीरुश्च लुव्धः कामी च ते दश |
८३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणश्च सङ्क्रुद्धो हय़ांस्तेषां महात्मनाम् |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वरमाणस्ततो भृत्यानासनानीत्यचोदय़त् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणस्ततो माय़ां प्रय़ोक्तुमुपचक्रमे ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणस्ततो याहि यतः प्राग्ज्योतिषाधिपः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणस्त्वराकाले द्रौणेर्धनुरथाच्छिनत् |
१२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणस्त्वराकाले पुनश्च दशभिः शरैः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणा महाराज युय़ुधानमय़ोधय़न् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणा महाराज सेनामुख्याः समाव्रजन् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणा महावीर्या माधवस्य वधैषिणः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
त्वरमाणा हि धावन्ति मम भर्ता भवेदिति ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणांस्तु तान्सर्वान्ससूतेष्वसनध्वजान् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणाः सुसंनद्धा हृष्टा युद्धाय़ निर्ययुः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
त्वरमाणास्त्वराकाले जिगीषन्तो महारथाः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणास्त्वराकाले विरथं षण्महारथाः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणास्त्वराकाले सर्वशस्त्रभृतां वराः |
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
त्वरमाणेव राजेन्द्र मृत्युर्धेनुकमभ्ययात् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणो द्विसप्तत्या सर्वमर्मस्वताडय़त् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणो महाराज सौमदत्तिर्न्यवारय़त् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणो महेष्वासः सव्ये पार्श्वे महावलः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
त्वरमाणो मृगव्याधः समभिक्रम्य वेगितः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणो रणे यत्तं कृतवर्मा न्यवारय़त् ||
९ ख