आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
स जीवः प्रच्युतः काय़ात्कर्मभिः स्वैः समावृतः |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
स जीवः सर्वगात्राणि गर्भस्याविश्य भागशः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
स जीवेत निरावाधः सुसुखी शरदां शतम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
स जीवेत्सुसुखं लोके ग्रामे द्रुम इवैकजः ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
स जीवो निरधिष्ठानश्चाव्यते मातरिश्वना ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
स जेष्यति रणे पार्थान्ससुहृद्गणवान्धवान् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
स ज्येष्ठपुत्रः कुन्त्या वै भ्रातास्माकं च मातृजः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
स ज्येष्ठपुत्रः सूतस्य ववृधेऽङ्गेषु वीर्यवान् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
स तं कृशमभिप्रेष्क्य सूनृतां वाचमुत्सृजन् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
स तं गत्वा क्षणेनैव पर्वतं वचनात्पितुः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
स तं गृह्य नृपश्रेष्ठः सचिवानिदमव्रवीत् |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
स तं घोरेण तपसा युक्तं दृष्ट्वा पुरन्दरः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
स तं जित्वा महाराज नैषादिं पाकशासनिः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
स तं तपोरतं मन्दं शनैः क्षपय़ते तुदन् |
२५ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स तं दुर्गन्धमालक्ष्य देवदूतमुवाच ह |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
स तं दुष्टमनुशिष्यात्प्रजान; न्न चेद्गृध्येदिति तस्मिन्न साधु ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
स तं दृष्ट्वा तथाभूतं राजानं घोरदर्शनम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
स तं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रं भीमो भीमपराक्रमः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
स तं दृष्ट्वा विनिहतं भीमसेनात्मजेन वै |
४० क
वन पर्व
अध्याय
१०४
लोमश उवाच
स तं दृष्ट्वैव वरदं पत्नीभ्यां सहितो नृपः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
८०
नारद उवाच
स तं दृष्ट्वोग्रतपसं दीप्यमानमिव श्रिय़ा |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स तं दृष्ट्वोवाच |
१२२ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
स तं द्रुमलतागुल्मच्छन्नं नीलशिलातलम् |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
स तं द्विपं सहसाभ्यापतन्त; मविध्यदर्कप्रतिमैः पृषत्कैः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
स तं न ममृषे द्रोणं युय़ुधानो महारथः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
स तं नादं भृशार्तानां श्रुत्वापि वलिनां वरः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
स तं नानापताकाभिः शोभितं रथमुत्तमम् |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
स तं निर्जित्य कौन्तेय़ो नातितीव्रेण कर्मणा |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
स तं निर्भिद्य तेनास्तः साय़कः सशरावरम् |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
स तं निर्भिद्य वेगेन भित्त्वा च कवचं महत् |
४४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
स तं निवृत्तमालक्ष्य प्राञ्जलिः पृष्ठतोऽन्वगात् |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
स तं पप्रच्छ कौन्तेय़ः पुनः पुनररिन्दमम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
स तं पप्रच्छ राजेन्द्रो मुनिं मौनव्रतान्वितम् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
स तं पुरोधाय़ सुखमवसद्भरतर्षभ |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स तं पुरोहितमुपादाय़ोपावृत्तो भ्रातृनुवाच |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स तं प्रत्युवाच |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
स तं प्रदक्षिणं कृत्वा त्रिः शैलं चोत्तरामुखः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
स तं मन्युसमाविष्टो धर्षय़ामास ते पिता ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
स तं महारथं पश्चादनुय़ातस्तवानुजम् |
३९ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
स तं रथं समास्थाय़ राजा कुरुकुलोद्वहः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
स तं रथं हेमविभूषिताङ्गं; साश्वं ससूतं सहसा विमृद्य |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
स तं रथवरं शौरिः सर्वशस्त्रभृतां वरः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
स तं रथवरं श्रीमान्समारुह्य किल प्रभो |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
स तं रुधिरसंसिक्तमनेकाग्रमनागसम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
स तं विदित्वा तु भृगुर्निश्चक्रामाश्रमात्तदा |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
स तं विदित्वा व्रह्मर्षिर्यममागतमोजसा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
स तं विपक्षरोमाणं कृत्वाग्नावपचत्तदा |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
स तं विवर्माणमथोत्तमेषुभिः; शरैश्चतुर्भिः कुपितः पराभिनत् |
३४ क
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
स तं वृक्षं दशव्यामं सस्कन्धविटपं वली |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
स तं व्राह्म्या श्रिय़ा युक्तं व्रह्मतुल्यपराक्रमम् |
५ क