chevron_left  स्वस्रेय़ांस्तान्पाण्डवेय़ान्विसृज्य;arrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
स्वस्रेय़ांस्तान्पाण्डवेय़ान्विसृज्य; सत्यां वाचं तां चिकीर्षुस्तरस्वी ||
९४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
स्वां तु धात्रेय़िकां तस्मै वृद्धाय़ प्राहिणोत्तदा ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
स्वां पुरीं प्रय़यौ कृष्णः पुरन्दर इवापरः ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
स्वां योनिं पुनरागम्य वर्तन्ते स्वेन कर्मणा |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
स्वागतं कुशलं चास्मै पर्यपृच्छद्यथातथम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २९३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वागतं चेति राधेय़स्तमथ प्रत्यभाषत ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वागतं त इति क्षिप्रमुवाच प्रतिपूज्य च ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
स्वागतं त इति प्रोक्ता तैः सर्वैस्तापसैश्च सा ||
६४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
स्वागतं तव वार्ष्णेय़ स्वागतं ते धनञ्जय़ |
५५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
संवर्त उवाच
स्वागतं ते पुरुहूतेह विद्व; न्यज्ञोऽद्याय़ं संनिहिते त्वय़ीन्द्र |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स्वागतं ते भगवन् |
११६ ख
वन पर्व
अध्याय ७२
केशिन्यु उवाच
स्वागतं ते मनुष्येन्द्र कुशलं ते व्रवीम्यहम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७
इन्द्र उवाच
स्वागतं ते महर्षेऽस्तु प्रीतोऽहं दर्शनात्तव |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
स्वागतं ते महाराज व्रूहि यद्यदिहेच्छसि |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
स्वागतं ते महावाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
वैशम्पाय़न उवाच
स्वागतं ते महावाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मेऽन्तिकम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स्वागतं ते वत्स |
१६४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
स्वागतं ते वरारोहे किं करोमि शुचिस्मिते ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
भीमसेन उवाच
स्वागतं ते वरारोहे यन्मा वेदय़से प्रिय़म् |
३० क
विराट पर्व
अध्याय १५
कीचक उवाच
स्वागतं ते सुकेशान्ते सुव्युष्टा रजनी मम |
१ क
मौसल पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वागतं तेऽस्त्विति प्राह मुनिः सत्यवतीसुतः |
३ क
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
स्वागतं तेऽस्त्विति मुनिं मुद्गलः प्रत्यभाषत |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
स्वागतं देवकीपुत्र स्वागतं ते धनञ्जय़ |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
स्वागतं देवराजाय़ विज्ञातस्तपसा मय़ा ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
स्वागतं धर्मपुत्राय़ भीमाय़ यमय़ोस्तथा ||
५५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
स्वागतं पुण्डरीकाक्ष सफलानि तपांसि नः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
राजधर्मो उवाच
स्वागतं भवते विप्र दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मे गृहम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
स्वागतं वां नरश्रेष्ठावुत्तिष्ठेतां गतक्लमौ |
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
स्वागतं वो महाभागाः स्वागतं वो महारथाः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
स्वागतं सर्वथा दिष्ट्या पाण्डोः पश्याम सन्ततिम् |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
स्वागतं सूर्यपुत्राय़ कालाय़ च महात्मने |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
अष्टावक्र उवाच
स्वागतं स्वागतेनास्तु भगवांस्तामभाषत |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
स्वागतेन च ते तत्र प्रतिपूज्य पुनः पुनः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४५
भीष्म उवाच
स्वागतेनागतं कृत्वा किं करोमीति चाव्रवीत् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
स्वागतेनाभिभाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वागतेनाभिभाष्याथ पृष्टश्चानामय़ं तदा ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
स्वागतेनाभ्यनन्दच्च गौतमं मित्रवत्सलः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वागतेनार्च्य वः सर्वाञ्श्रावय़े वाक्यमुत्तमम् ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
स्वागतेनैव सर्वेषां भूतानामविहिंसकः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
स्वाचारा चैव साध्वी च सुवेषा चैव भामिनी ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
स्वातावथ धनं दत्त्वा यदिष्टतममात्मनः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
स्वातिय़ोगे पितॄनर्च्य वाणिज्यमुपजीवति ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
व्राह्मण उवाच
स्वात्मतृप्ता यतो यान्ति साक्षाद्दान्ताः पितामहम् ||
२२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
स्वादनीय़ानि भूतानां न यैर्वालोऽपि तृप्यते ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
स्वादु देशे च काले च ववर्षाप्याय़यन्प्रजाः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
स्वादुकामुक कामानां वैतृष्ण्यं किं न गच्छसि |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
स्वादुक्षीरप्रदा धन्या मम नित्यं निवेशने ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वादुमूलफलं रम्यं मार्कण्डेय़ाश्रमं प्रति ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
स्वाधर्षा हतसिंहेव महती गिरिकन्दरा |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
स्वाध्याय़ एषां देवत्वं तप एषां सतामिव |
३१ क