शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
चातुर्मास्यैर्वहुविधैर्यजन्ते ये तपोधनाः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
चातुर्वर्ण्यं चातुराश्रम्यधर्माः; सर्वे न स्युर्व्रह्मणो वै विनाशात् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
चातुर्वर्ण्यं तथा वेदाश्चातुराश्रम्यमेव च |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
चातुर्वर्ण्यं तथैवात्र चातुर्वेद्यं च वर्णितम् |
८२ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
चातुर्वर्ण्यं प्रमाणं च सत्यं च व्रह्म चैव ह |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
उमो उवाच
चातुर्वर्ण्यं भगवता पूर्वं सृष्टं स्वय़म्भुवा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
चातुर्वर्ण्यं भवति च सम्प्रमूढं; ततः प्रजाः क्षय़संस्था भवन्ति ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
चातुर्वर्ण्यं महाराज राष्ट्रं ते कुरुजाङ्गलम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
चातुर्वर्ण्यं मय़ा सृष्टं गुणकर्मविभागशः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
चातुर्वर्ण्यं यथाय़ोगं स्वे स्वे धर्मे न्यवेशय़त् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
चातुर्वर्ण्यं यदा कृत्स्नमुन्मर्यादं भविष्यति |
११४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
चातुर्वर्ण्यं स्थापय़ित्वा स्वधर्मे; पूतात्मा वै मोदते देवलोके ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
चातुर्वर्ण्यं स्थापय़ित्वा स्वधर्मे; वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
चातुर्वर्ण्यं स्वधर्मस्थं स कृत्वा पर्यरक्षत |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
चातुर्वर्ण्यस्थापनात्पालनाच्च; तैस्तैर्योगैर्निय़मैरौरसैश्च ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य कर्माणि चातुर्वर्ण्यं च केवलम् |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य कर्माणि विहितानि मनीषिभिः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मं च पृच्छैनं पृथिवीपते ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
उमो उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मं हि नैपुण्येन प्रकीर्तय़ ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य धर्माणां सङ्करो न प्रशस्यते |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
युधिष्ठिर उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मात्मन्धर्मः प्रोक्तस्त्वय़ानघ |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य धर्माश्च रक्षितव्या महीक्षिता |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य प्रथमं विभाग; मवेक्ष्य त्वं सञ्जय़ स्वं च कर्म |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
उमो उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य यो धर्मः स्वे स्वे वर्णे गुणावहः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भरद्वाज उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य वर्णेन यदि वर्णो विभज्यते |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
चातुर्वर्ण्यस्यैष धर्मस्तवोक्तो; हेतुं चात्र व्रुवतो मे निवोध |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
चातुर्वर्ण्याप्रमोहाय़ सुनीतनय़नाय़ च |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
चातुर्वर्ण्ये यथाशास्त्रं प्रवृत्तो धर्मकाम्यया ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
चातुर्वर्ण्ये स्वधर्मस्थे मर्यादानामसङ्करे |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
चातुर्वर्ण्येन यश्चैको धर्मो न स्म विरुध्यते |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
चातुर्विद्यं तथा वर्णांश्चतुरश्चाश्रमान्पृथक् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
चातुर्वेदे च यत्पुण्यं सत्यवादिषु चैव यत् |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
चातुर्वेद्यं चातुर्होत्रं चातुराश्रम्यमेव च |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
चातुर्वेद्ये च ये प्रोक्ताश्चातुर्होत्रे च भारत |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
चातुर्होत्रं च धुर्या मे शरा दर्भा हविर्यशः ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
चातुर्होत्रविधानस्य विधानमिह यादृशम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
चान्द्राय़णं चरेन्मासं कृच्छ्रं वा पापशुद्धय़े ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
चान्द्राय़णानि विधिवल्लिङ्गानि विविधानि च ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
चापं च रुक्मविकृतं विधुन्वन्गजमूर्धनि |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
चापं भरतशार्दूलस्त्यक्तात्मा कर्णमभ्ययात् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
चापं वा यदि वा शक्तिं निस्त्रिंशं वा परश्वधम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
चापध्वजोपस्करेभ्यश्छत्रादीषामुखाद्युगात् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
चापमण्डलमेवास्य विस्फुरद्दिक्ष्वदृश्यत |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
चापमार्गवलोद्धूतान्मार्गणान्वृष्णिसिंहय़ोः |
७१ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
चापमुद्गरहस्तैश्च स्रग्विभिः सर्वतो वृतम् ||
४ ग
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
चापमेकेन चिच्छेद हार्दिक्यो नतपर्वणा ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
चापलादिह गच्छन्तं पार्थ यानमतः परम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
चापविद्युत्प्रभो घोरो रथगुल्मवलाहकः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
चापविद्युद्ध्वजो घोरो गुप्तो गाण्डीवधन्वना ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
चापवेगवलोद्धूतान्मार्गणान्वृष्णिसिंहय़ोः |
१४ क