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शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
दुर्वलात्मन उत्पन्नं प्राय़श्चित्तमिति श्रुतिः ||
१२ ग
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
दुर्वलानां तु भूतानां तनुं यः सम्प्रय़च्छति |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
दुर्वलार्थं वलं सृष्टं धात्रा मान्धातरुच्यते |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
दुर्वलाश्चापि सततं नावष्टभ्या वलीय़सा |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
दुर्वलोऽहं न मे शक्तिर्भवतां परिपालने |
३ क
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
दुर्वसं त्वेव कौरव्या जानता राजवेश्मनि |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
दुर्वाग्भावं रतिं चैव ददौ स्त्रीभ्यः प्रजापतिः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्वाचा निग्रहो दण्डो हिरण्यवहुलस्तथा |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
दुर्वाचा निग्रहो वन्धो हिरण्यं वाह्यतःक्रिय़ा ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
दुर्वारणं दुर्दृशं तिग्ममन्युं; महात्मानं सर्वहरं प्रचेतसम् |
५८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
दुर्वारणाय़ शुक्राय़ व्रह्मणे व्रह्मचारिणे ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
दुर्वासतां विदित्वा च भर्तुस्तेऽतितपस्विनः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
दुर्वाससं वासय़ेत्को व्राह्मणं सत्कृतं गृहे |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
युधिष्ठिर उवाच
दुर्वाससः प्रसादात्ते यत्तदा मधुसूदन |
१ क
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्वाससा पाय़सोच्छिष्टलिप्ते; यच्चाप्युक्तं तच्च सस्मार कृष्णः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्वासा जमदग्निश्च मार्कण्डेय़ोऽथ गालवः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
दुर्वासा नाम विप्रर्षिस्तथा परमकोपनः |
९ क
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
दुर्वासा नृप दिग्वासास्तमथाभ्याजगाम ह ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
दुर्वासा वै तेन नान्येन शक्यो; गृहे राजन्वासय़ितुं महौजाः |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
दुर्वासाश्च दीर्घतपा याज्ञवल्क्योऽथ भालुकिः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ८३
नारद उवाच
दुर्वासाश्च मुनिश्रेष्ठो गालवश्च महातपाः ||
१०४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
युधिष्ठिर उवाच
दुर्विज्ञेय़मिदं तात विष्णोरमिततेजसः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
दुर्विज्ञेय़ा गतिर्नूनं कार्याणां कारणान्तरे |
१८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
दुर्विज्ञेय़ा हि गतय़ः पुरुषाणां मता मम |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्विज्ञेय़ो दुष्करश्च सात्वतैर्धार्यते सदा ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भीष्म उवाच
दुर्विज्ञेय़ो ह्यनन्तत्वात्सिद्धैरपि न संशय़ः ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्विदा गतिरर्थानामपि ये दिव्यचक्षुषः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २३८
दुर्योधन उवाच
दुर्विनीताः श्रिय़ं प्राप्य विद्यामैश्वर्यमेव च |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय ५९
विदुर उवाच
दुर्विभाव्यं भवति त्वादृशेन; न मन्द सम्वुध्यसि पाशवद्धः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
दुर्विमोचनमाहत्य प्रेषय़ामास मृत्यवे ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
दुर्वुद्धिमकृतप्रज्ञं छन्नं कूपं तृणैरिव |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
दुर्वुद्धिरकृतप्रज्ञश्चले मनसि तिष्ठति |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्वुद्धिर्दुर्मतिश्चैव कुरूणामय़शस्करः ||
८० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्वुद्धीनामशिष्टानां वहूनां पापचेतसाम् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्वुद्धेर्दुःसहाय़स्य समर्थं व्रुवती वचः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
दुर्वृत्तं धार्तराष्ट्राणामुक्तवान्भगवानृषिः ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय २१८
ऋषय़ ऊचुः
दुर्वृत्तानां संहरति वृत्तस्थानां प्रय़च्छति |
१० क
वन पर्व
अध्याय २३५
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्वृत्तो धार्तराष्ट्रोऽय़ं सामात्यज्ञातिवान्धवः ||
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्वृत्तो विदुरं प्राह द्यूते किं जितमित्युत ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्व्याहृताच्छङ्कमाना दुःस्थिताद्दुरवेक्षितात् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
दुर्व्याहृताच्छङ्कमानो दुष्कृताद्दुरधिष्ठितात् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
दुर्हृदस्तापय़न्सर्वान्नन्दय़ंश्चापि वान्धवान् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय १२६
दुर्योधन उवाच
दुर्हृदां कुरु सर्वेषां मूर्ध्नि पादमरिन्दम ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्हृदामप्रहर्षाय़ सुहृदां नन्दनाय़ च |
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
दुर्हृदामप्रहर्षाय़ सुहृदां हर्षणाय़ च ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
दुश्चरं जीवलोकेऽस्मिन्सत्त्वं प्रति समाश्रितम् |
५३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
दुश्चरा द्वादश समा हत्वा पितरमद्य वै |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
दुश्च्यावश्च्यावनो जेता हन्ता व्रह्मद्विषां हरः |
८८ क
वन पर्व
अध्याय १९६
मार्कण्डेय़ उवाच
दुष्करं कुरुते माता विवर्धय़ति या प्रजाः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ६५
सुदेव उवाच
दुष्करं कुरुतेऽत्यर्थं हीनो यदनय़ा नलः |
१९ क