उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
अभूत्वा हि भवन्त्यर्था भूत्वा नश्यन्ति चापरे ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
अभूद्धनं मे विपुलं महद्वै; विचेष्टमानो नाधिगन्ता तदस्मि |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
अभूद्विरोषोऽर्जुनको विशोका चैव गौतमी ||
७३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अभून्न यद्भस्मसान्मद्रराज; स्तदद्भुतं मे प्रतिभाति राजन् ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
अभूवन्वाहिनीमध्ये शतानामय़ुतानि षट् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
अभृतानां च भरणं भृतानां चान्ववेक्षणम् |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
अभृतानां भवेद्भर्ता भृतानां चान्ववेक्षकः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
अभेत्ता परगुह्यानां तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
अभेदात्कुरुवंशस्य कार्ययोगात्तथैव च ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
अभेदात्कुरुवंशस्य प्रजानां च विवृद्धय़े ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
अभेदे च गुणान्राजन्पुनः पुनररिन्दम ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
अभेद्यं कवचं चेदं स्पर्शरूपवदुत्तमम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
अभेद्यं कवचं चैव सद्यस्तमुपसंश्रय़न् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१७१
अर्जुन उवाच
अभेद्यं कवचं दिव्यं स्रजं चैव हिरण्मय़ीम् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
अभेद्यं कवचं दिव्यमक्षय़्यौ च महेषुधी |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
अभेद्यं भास्करेणापि स्वय़ं वा कृष्णवर्त्मना ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
अभेद्यः सर्वशस्त्राणां प्रभिन्न इव वारणः |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अभेद्यकल्पं मत्स्यानां राजा कवचमाहरत् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
अभेद्यकवचं मत्वा कर्णमद्भुतविक्रमम् |
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
अभेद्यकवचः श्रीमान्मातङ्ग इव यूथपः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अभेद्यमस्य कवचं युवा चाशुपराक्रमः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
अभेद्यमिव सम्प्रेक्ष्य विषण्णोऽर्जुनमव्रवीत् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
अभेद्यानि ततः सर्वे समनह्यन्त भारत |
२ क
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
अभेद्यैः कवचैर्युक्तास्तीर्थान्यन्वचरंस्तदा ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
अभैष्म यस्मान्मरणादिव प्रजाः; स वीर दिष्ट्या निहतस्त्वय़ा रिपुः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
अभोगिनोऽवलाश्चैव यान्ति स्थानमनुत्तमम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
अभोग्या ह्योषधीश्छित्त्वा भोग्या एव पचन्त्युत ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१४
भीष्म उवाच
अभोजनेन तेनास्य जितः स्वर्गो भवत्युत ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
अभोजनेन तेनास्य जितः स्वर्गो भवत्युत ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
अभोज्यं चाप्यपेय़ं च धेन्वा दुग्धमनिर्दशम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
अभोज्यमिदमित्याह क्रोधपर्याकुलेक्षणः ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
अभोज्यान्नानि चाश्नाति स द्विजत्वात्पतेत वै ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
अभोज्यान्नानि चाश्नीय़ात्तथेदं नात्र संशय़ः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
अभोज्याश्चाप्यभक्ष्याश्च व्राह्मणैर्गृहमेधिभिः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
अभोजय़न्त मृष्टान्नैः सूदाः परमसंस्कृतैः ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
अभ्यकीर्यन्त वृन्दानि दामग्रन्थिमुदीक्षताम् |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
अभ्यक्रोशन्सोमकास्तत्र पार्थं; त्वरस्व याह्यर्जुन विध्य कर्णम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
अभ्यगच्छं जवेनाशु प्रीत्या तेजोनिधिं प्रभुम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
अभ्यगच्छं तदा राममर्चिष्यन्द्विजसत्तमम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
अभ्यगच्छंस्तथान्योन्यं मत्ता गजवृषा इव ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्यगच्छः पतिं यं त्वं भजमानं शकुन्तले ||
२७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्यगच्छत गान्धारीमार्तामार्ततरा स्वय़म् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
अभ्यगच्छत तं विप्रं न्याय़तः कुरुनन्दन ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्यगच्छत धर्मात्मा धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३०
लोमश उवाच
अभ्यगच्छत राजानं ज्ञातुमग्निश्च भारत ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
अभ्यगच्छत सव्रीडा नहुषं घोरदर्शनम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
अभ्यगच्छत्कोसलाय़ामृतुपर्णनिवेशने ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
भीष्म उवाच
अभ्यगच्छत्ततो रामः सह तैर्व्राह्मणर्षभैः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्यगच्छत्तदा विप्रो वासुदेवधनञ्जय़ौ ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
अभ्यगच्छत्तदैवाशु वृद्धामात्यं पितुर्हितम् |
६५ क